| बाए से भरत ,अमित ,सोनू ,बंटी ,बहन |
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| आदि और बहन |
अपनी जिंदगी के अब
तक बीते सफर में नही जानता था की दशरथ मांझी कौन था ,कैसा था ,क्या करता था। पर उन नई उम्र के लड़को
के बार बार कहने पर की ,बड़े भाई
फिल्म देखना तो बनती है। जिनके नाम है बंटी,आदी और एक और भी है ऊर्जा से भरा अंकित , उससे मुलाकात कुछ देर की सही पर शानदार ,जबरदस्त जिंदाबाद थी कुछ दिन भोपाल में उनके ठिकाने पर बीते ,सच कुछ दिन में ही बहुत कुछ दें दिया और उस दिए हुए में था सिर्फ प्यार अपनापन जो राखी बाले दिन भी बरकरार रहा आदी की ब़ड़ी बहन ने राखी बांधकर मेरे अंदर बहन न होने की मायूसी को कम किया तो बंटी और आदी ने छोटे भाई न होने की ऊदासी को याद ही आने दिया उन 6 दिनो में। और इन 6 दिनो में दिन और रात चावल खाना भी रोज सीख गए जो कभी हफ्ते में खाते थे लड़के बालाघाट म.प्र से ताल्लुक रखते है जहां चावल सबसे अधिक प्रिय है और इन्ही भूमि पुत्रो की जिज्ञासा को देखकर ,साथ बैठकर देखडाली कहानी दशरथ मांझी उर्फ माउंटेन मेन की जिसकी हथोड़ी की मार जो सन्न कर देती है हर कठीनाई भरे रास्ते को और फगुनिया जैसी आवाज जो हर वक्त गूंजती रहती है प्रेरणा बनकर उसके कानो में और एक चींज जिसका होना बहुत जरूरी है आपमें मुझमें वो है अपने गोल के लिए शानदार जबरदस्त ,जिंदाबाद वाला पागलपन जिसके बिना चाय भी पीना बैसे ही है जैसे किसी के साथ होकर भी किसी और के साथ होना यही तो कर रहें है सब लोग जो बनना तो चाहते है बाहूवली पर त्याग और बलिदान के नाम पर छोड़ देते है पसीना और कहने लगते है पागल जो अपने आप में एक ऐसा शब्द है जो महान और ज्ञानी के लिए ही बना है। सच जिंदगी भर अपने कामो को करते वक्त कानो में गूंज़ता रहना चाहिए मांझी फिल्म का वो डायलाँग, जो एक पत्रकार से सवाल जबाब करते वक्त दशरथ मांझी ने कहे थे । पत्रकार कहता है की खुदका अखबार निकालना आसान नही दशरथ भाई तो दशरथ कहते है की क्या अकेले पहाड़ तोड़ने से भी ज्यादा मुशकिल है बाबु ...............
हम तो से इतना प्यार
करते, इतना प्यार करते, इतना प्यार करते, इतना प्यार करते, इतना प्यार करते, इतना
प्यार करते, इतना प्यार करते, इतना प्यार करते, क्या अब सीना चीररर के दिखांए
फगुनिया, फगुनिया, फगुनिया, फगुनिया, फगुनिया, फगुनिया, फगुनिया
हाहाहहाहहाहहाहहाहाहहा शानदार ,जबरदस्त जिंदाबाद ...
