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शुक्रवार, 31 दिसंबर 2010

स्वागतम 2011 ...

ईश्वर आपकी समस्याओ को उतनी देर में सुलझाये जितनी देर तक आपके संकल्प रहते है जय हो ,शुभ हो मंगलमय हो ........

रविवार, 12 दिसंबर 2010

वो दिन भी ……..

वो   din bhi kitne achche the,
Jab kandhoon pe mere baste the,
Budhe haath ki ek ungali,
Aur tedhe-medhe raste the,
Unn rastoon pe,
Mere saare sanghi rahte the,
Ek gali mein,
Sonu ka ghar,
Ek gali mein monu tha,       
Ek gali ke,                                                     
ek mod pe,
wo meri meena rahti thi,
kad mein thodi choti thi,
par baatein moti-moti thi,
baal the uske bikhre, phir bhi,
do-do choti karti thi,
ek roz kahaah tha maine usse,
roz wo maa se ladti thi,
maa bhar de meri aankh mein kajal,
mere liye, zid karti thi,
baste ke ek kone mein,
mujhko bhati,
kuch toofi rakhti thi,
mujhko achchi nahi lagti hain,
roz ye dekar, mujhse kahti thi,
uske baaloon ki khatir,
jeb mein kanghi rakhta tha,
saari raah wo kanghi karti,
main basta lekar chalta tha,
uski sab baatein suntan tha,
jab hansti thi, tab hansta tha,
phir ek din,
ek safhe si,
palat gayi zindgi,
chut gayi wo saari galiyaan,
chut gaye wo saare sanghi,
magar mere kandhoon pe aaj bhi,
uss baste ki thakaan baaki है ………..!
शेलेन्द्र .आर .कुमार लेखक मुंबई मायानगरी में फिल्म लेखक और मेरे करीबी मित्र है

शादी का सफ़र

आज पुरे ९ दिनों बाद शहर में वापस आ गया हु इस्टेसन के उतरने के साथ ही दिल्ली की सर्दी ने काँप ने पर मजबूर कर दिया इससे पहले मोबाइल निकालू और वही नंबर घुमाऊ इससे अच्छा होगा ९ दिन पहले चलते है ! इस बार अपने जन्म स्थान जाने का मकसद बहुत खास था कहा जाये तो दो मकसद थे पहला अपने बहुत खास मित्र की शादी और दूसरा अपने खास मित्र से मिलने का जूनून जो पिछले डेढ़ साल से दिल में कही छुप कर बैठा था !  आज  पूरे तीन साल बाद भी कल ही की बात लगती है ,लगता कल ही हमने पुष्पेन्द्र की फोटो पर हार माला डाल कर होस्टल के सभी लडको को इकठा  कर के उसकी शोक सभा लगा दी थी ये पुष्पेन्द्र वही है जिनकी शादी २ दिसम्बर २०१० को थी और लगता है कल रात की बात तो है जब मैंने और नितेश ने टल्ली होकर पूरे होस्टल को सर पर उठा लिया था उस रात मेरे दोस्त मै तुझे छोड़ कर नहीं जाता पर क्या करू मै खुद उस हालत मै था की संभल नहीं प् रहा था लेकिन जब हम मिले तो ऐसा नहीं लगा की तू या में किसी बात से नाराज होंगे इसके लिए शुक्रिया ! इन दो दिनों को कभी नहीं भूलूंगा जो तुम तीनो ने मुझे दिये अमित ,रंधीर ,नितेश ये मेरे  कालेज के दिनों के साथी है जो आज भी वैसे है जेसे पहले थे सफ़र के दोरान इंतनी मस्ती हुई के आप सोच भी नहीं सकते हम चारो को देख कर सभी यही सोच रहे थे की कालेज के लफंगे परिंदे है जबकि सभी चोथे स्तंभ को पकडे हुए है नितेश और रंधीर  भोपाल राज एक्सप्रेस मै रिपोर्टर है तो अमित पत्रिका से जुड़े हुए है और रही बात मेरी तो हम तो आशिक मिजाज़ है आशिकी से काम कर रहे है सच मै एक यादगार सफ़र और शब्दों को समेट ने से पहले पुष्पेन्द्र उर्फ़ कुअर साहब को ढेर सारी शादी की शुभकामना !और कमरे पर  आ चुका हु अब उससे ढेर सारी बाते करूँगा पर क्या करे तन्हाई है जो ऐसा नहीं करने देगी !