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गुरुवार, 29 अक्टूबर 2015

उन में कही दिखाई देगा मांउटेन मैन...

बाए से भरत ,अमित ,सोनू ,बंटी ,बहन 
आदि और बहन 
अपनी जिंदगी के अब तक बीते सफर में नही जानता था की दशरथ मांझी कौन था ,कैसा था ,क्या करता था। पर उन नई उम्र के लड़को के बार बार कहने पर की ,बड़े भाई

फिल्म देखना तो बनती है। जिनके  नाम है बंटी,आदी और एक  और भी है ऊर्जा से भरा अंकित ,  उससे मुलाकात कुछ देर की सही पर शानदार ,जबरदस्त जिंदाबाद थी कुछ दिन भोपाल में उनके ठिकाने पर बीते ,सच कुछ दिन में ही बहुत कुछ दें दिया  और उस दिए हुए में था सिर्फ प्यार अपनापन जो राखी बाले दिन भी बरकरार रहा आदी की ब़ड़ी बहन ने राखी बांधकर मेरे अंदर बहन न होने की मायूसी को कम किया तो बंटी और आदी ने छोटे भाई न होने की ऊदासी को याद ही आने दिया उन 6 दिनो में। और इन 6 दिनो में दिन और रात  चावल खाना भी  रोज सीख गए जो कभी हफ्ते में खाते थे लड़के बालाघाट म.प्र से ताल्लुक रखते है जहां चावल सबसे अधिक प्रिय है और इन्ही भूमि पुत्रो की जिज्ञासा को देखकर ,साथ बैठकर देखडाली कहानी दशरथ मांझी उर्फ माउंटेन मेन की जिसकी हथोड़ी की मार जो सन्न कर देती है हर कठीनाई भरे रास्ते को और फगुनिया जैसी आवाज जो हर वक्त गूंजती रहती है प्रेरणा बनकर उसके कानो में और एक चींज जिसका होना बहुत जरूरी है  आपमें मुझमें वो है अपने गोल के लिए शानदार जबरदस्त ,जिंदाबाद वाला पागलपन जिसके बिना चाय भी पीना बैसे ही है जैसे किसी के साथ होकर भी किसी और के साथ होना यही तो कर रहें है सब लोग जो बनना तो चाहते है बाहूवली पर त्याग और बलिदान के नाम पर छोड़ देते है पसीना और कहने लगते है पागल जो अपने आप में एक ऐसा शब्द है जो महान और ज्ञानी के लिए ही बना है। सच जिंदगी भर अपने कामो को करते वक्त कानो में गूंज़ता रहना चाहिए मांझी फिल्म का वो डायलाँग, जो एक पत्रकार से सवाल जबाब करते वक्त दशरथ मांझी ने कहे थे । पत्रकार कहता है की खुदका अखबार निकालना आसान नही दशरथ भाई तो दशरथ कहते है की क्या  अकेले पहाड़ तोड़ने से भी ज्यादा मुशकिल है बाबु ...............


हम तो से इतना प्यार करते, इतना प्यार करते, इतना प्यार करते, इतना प्यार करते, इतना प्यार करते, इतना प्यार करते, इतना प्यार करते, इतना प्यार करते, क्या अब सीना चीररर के दिखांए फगुनिया, फगुनिया, फगुनिया, फगुनिया, फगुनिया, फगुनिया, फगुनिया हाहाहहाहहाहहाहहाहाहहा शानदार ,जबरदस्त जिंदाबाद ...     

गुरुवार, 8 मई 2014

ख्याल ?

उम्र ठीक ठाक ही है 28 के करीब पर  फोन में एक नंबर ही मिला जिसे दिल ने कहां हां ये अपना है हां बस यही है ... क्या दूर रहकर करीब हुआ जा सकता है क्या दूरी एक नई नजदीकी है जहां दूर जाने पर सारे खतरे हैं... बुरे ख्यालों के सच होने के, वहीं ये संभावना भी है कि आप अपने फोकस को फिर से एडजस्ट कर कई नये सत्यों को ठीक से देख सकते हैंसाथ होने से पहले तक हजारों ख्वाहिशों की कितनी लम्बी फेहरिस्त है उसके साथ हर वह चीज़ करनी है, जिसका वास्ता खुशी से है खुशी का बांटा ही स्वर्ग है, न बांटा ही नरक साथ की खुशी उस खुशी से अलग है, जिसका वायदा हजारों ख्वाहिशों में है 'साथ छूटने पर ऐसा क्यों होता है कि साथ छोटा हो जाता है और छूटना बड़ा कोई बात नहीं है अगर कुछ दिन बिल्कुल सामान्य हों पर उनका महान न होना और सामान्य होना तुम्हें जीने से नहीं रोक सकता अक्सर वही दिन होते हैं, जब हमें सिर झुकाए सूरजमुखी और टूटे पर वाले परिंदे दिखलाई पड़ते हैं वे हमारे भीतर के नये मायनों को खोलते हैं एक ऐसे ही दिन तुम मुझे मिले मुझे वह तारीख याद नहीं पर देखो तुमने मेरा क्या हाल कर दिया।  अब वो आवाज़ उसे जगाती, छेड़ती. आवाज़ उसके साथ प्यार करती आवाज़ उसके बिस्तर की सलवटों को पढ़ती आवाज़ उसे सुला देती आवाज़ उसके सपनों और स्मृतियों को गड्ड मड्ड कर देती कभी यहाँ से बुलाती कभी वहां से आवाज़ कवितायेँ पढ़ती आवाज़ एक लम्बा वाक्य कहती. आवाज़ एक लम्बे वाक्य को दुबारा कहती आवाज़ कई बार एक दूसरे वाक्य को अधूरा छोड़ देती आवाज़ चुप्पी को ताड़ जाती, उसे समझा लेती, बुझा लेती आवाज़ उस वाक्य को पूरा करती आवाज़ उसे पेट से हंसा देती और कई बार इतनी खामोशी से भर देती की वक़्त रेगिस्तान से गुज़र रहा है तारे रास्ते दिखलाते हैं जासूस बीच बीच में अपने निशान मिटाता चलता है क्या उसके पीछे भी कुछ लगा हुआ है शक और वहम की तरह आदिम, जो अकेले अंधेरे में मूतते वक़्त कंपकंपी की तरह छूटता है हर दिन मुझे खुद को तुम्हें फोन करने से रोकना पड़ता है वे दूर है, पर जुदा नहीं । जब भी अकेले होते साथ होते । बहुत दिनों तक जब वे करीब न हो पाते तो शब्दों से एक दूसरे को छूते शब्द शरीर बन जाते ।  कई बार शब्द चुक जाते । पर साथ होने के लिए ज़रूरी था कुछ तो कहना ।....   

शनिवार, 16 मार्च 2013

हाँ दोस्त में बारिश लाया हुँ ...

हां मेरे दोस्त में बारीश लाऊँगा ,वही बारिश जो गीली होती हें, और इसे पानी भी कहते हें ,उर्दु में आव ,मराठी में पाणी, तामिल में तन्नी, कन्नण में नीर और बंगला में इसे जोल कहते हैं। संस्कृत में जिसे वारी ,नीर,जीवन,अमृत,उद्ध भी कहते हें,र्गीक में अकवाप्यूरा इंगलिश में “Water” केमिस्ट्री में H2o भी कहते हें। ये पानी जब आँख से गिरता हें तो आँसु कहलाता हें ,लेकिन जब चेहरे पर चढ़ जाये तो रूवाब बन जाता हैं। कोई शर्म से पानी 2 हो जाता हें ,तो कभी 2 ये पानी सरकारी फाइलो में अपने कुँए समेर चोरी हो जाता हैं। तो मेरे दोस्त ये बारिश खरीदीए सस्ती,सुंदर और टीकाउ सिर्फ 5000 में इससे कम में कोई दें तो जो चोर कि सजा वो मेरी आपकी जूती सर पर मेरी पर दोस्त मेरी बारिश खरीदीए...     

शनिवार, 8 दिसंबर 2012

कहानी ए -दस्ता 1500



Not My Pic. But Same these Days 
1500 (एक कॉल सेंटर का नंबर ) से  बातचीत के जरिए हम एक दुसरे के विचारो के नज़दीक आने लगे थे , रुकिए थोडा पीछे चलते है ! वक़्त सुबह 7 बजे का था जब मैंने  अपनी सिफ्ट  शुरू  ही की थी और उन सर्द दिनों की वजह से तबियत भी साथ नहीं दे रही थी बस ट्रिंग 2 शुरु  हो चुकी थी और ये लाइन बोलते बोले उबकाई आने लगी थी के नमस्कार ..... में आपका स्वागत है में आपकी क्या सहायता कर  सकता हु की तभी अचानक  एक धीमी आवाज़ ने मुझे नींद से जगा दिया मैंने वही लाइन  दोहरा दी और सामने से तपाक  से जबाब आया क्या आपकी तबियत ठीक नहीं है, में सन्न  हो गया क्योकि अभी तक कॉल सेंटर में बेहूदा बाते और बेवजह की  शिकायते  ही सुनी थी , सच पूछिए तो रहा नहीं गया और बोल ही दिया सच, की कल रात दोस्त की दावत में खाने और पीने में एसा हुआ है मगर क्या करे नोकरी तो करनी है सो आना पड़ा सामने वाली आवाज़ ने कुछ हिदायते और दबायियो के नाम दिए  पता नहीं किस किस्म की बेहोसी में सब कुछ सुनता रहा और तभी उस आवाज़ ने कहा में दोवारा फोन करुँगी आप का नंबर यही है मैंने हडबडाते हुए कहा नहीं नहीं आप जब दोवारा फोन करेंगी तो पता नहीं आपकी ये सहानुभूति भरी आवाज़ किसी सुने दे क्यों की यहाँ इस नंबर पर 15 लोग बैठते है जो इसी नंबर से जुड़े हुए है पर आपका नंबर मेरी स्क्रीन पर दिख रहा है आप कहे तो में अपना हाल इस नंबर पर बता दूंगा जबाब में हाँ था और मेरी खस्ता हालत इस्फुर्ती में बदल चुकी थी फोन कट होने के बाद मेरी बेवजह की  चिंता बड  चुकी थी की पता नहीं किसी और के पास ये कॉल आता तो मेरा क्या होता ह्हह्हा हहह और मन ही मन अपने मुर्खता वाले उठते प्रश्नों पर हसी भी अ रही थी खेर सिफ्ट  ख़त्म होने के बाद बार 2 में उस नंबर को डायल  करता और काट देता यह सोच कर की पता नहीं कही नंबर गलत हुआ ,या उसने बात नहीं की ,वो शादीसुदा हुई जेसे ख्याल मन में गोते लगा रहे थे खेर हिम्मत करते हुए फोन लगा ही दिया और सामने से मेरे बोलने से पहले ही आवाज़ आई ,,तो आपकी तबियत ठीक हुई या नहीं ,, में फिर से सन्न था मैंने तुरंत पूछ डाला आपको कैसे पता ये मेरा नंबर है उसने हसी में कहा मेरे फोन में जो फोन करता है उसकी तस्वीर अ जाती है तब तक में संभला और हस्ते हुए पुछा बताईए  न कैसे पता चला उसने अपनी आवाज़ को थामते हुए कहा मेरे फोन पर मेरे पापा ,बहन .भाई के सिवा अगर कोई फोन आता है तो में उठाती नहीं हु ठीक वेसा प्रशन दिमाग में आया जेसा आपके दिमाग में अभी आया हुआ होगा की अब कैसे उठा लिया प्रशन जिज्ञसा से भरा था उसने तुरंत कहा मुझे आपके फोन का इन्तजार था इसलिए बस इतना कहते ही में अपने उन सपनो में खो चूका था जो 20 साल के लड़के के होते है उस समय मेरी इतनी ही उम्र रही होगी ! खेर बातो का दौर सुरु हो चूका था और में बात करते 2 और साथ बाइक का कान मरोड़ते हुए अपने रूम पर पहुँच चूका था इस बीच कुछ ईएसआई बाते भी हई जिसने मुझे उदास भी किया और उसकी  तरफ खींचने पर मजबूर कर दिया जेसे उसने कहा की अभी 2 साल पहले ही मेरी माँ का स्वर्वास हुआ है तब से में और पापा ही घर पर रहते है भाई और बहन शहर  में पड़ते है लगा की बस उसके साथ बैठकर ये बाते करू पर अपने आप को रोका और बाते घुमाने लगा ताकि उसे यादो को भूलने में मदद मिले खेर बाते करते 2 देर हो चुकी थी और वो काम करते हुए बाते करती जा रही थी तभी उसके  दरवाजे की घंटी बजी जो मिझे साफ़ सुनाई  दी उसने दरवाज़ा खोला सामने पापा ही होंगे तभी फोन बिना कुछ कहे बिना काट दिया और में तड़प उठा ठीक वेसे ही जेसे किसी मछली को पानी से निकल दिया हो आज ,,इतने सालो बाद भी वो तड़प बरकरार है क्योकि उसकी शादी के ठीक एक दिन पहले उसने कहा था की कभी न कभी हम तहुम्र के लिए मिलेंगे मैंने भरे हुए शब्दों में कहा हां बिलकुल', सालो  की मोहलत मिलने पर मैंने राहत की सांस लेते हुए जवाब दिया।' मेरा यकीन करें,आज भी में अपने उस काल सेंटर की उस मेज पर जाकर बिलकुल वेसी ही इस्फुर्ती महसूस करता हु और एक लम्बी दूरी तय करके में  भी उसके और अपने शहर से दूर अ चूका हु पर आज भी मेरे दिमाग में 1500 नंबर डेड पड़ा हुआ है 

सोमवार, 5 दिसंबर 2011

छिपकली के नाना

मध्यप्रदेश के एक खोजकर्ता समूह का दावा है कि जीवाश्मों के जुरासिक खजाने से समृद्ध नर्मदा घाटी के भीतर इन सवालों के जवाब

गुरुवार, 17 नवंबर 2011

शराबी

एक

शराबी के लिए
हर रात
आखिरी रात होती है.

शराबी की सुबह
हर रोज
एक नयी सुबह.

दो

हर शराबी कहता है
दूसरे शराबी से
कम पिया करो.

शराबी शराबी के
गले मिलकर रोता है.
शराबी शराबी के
गले मिलकर हंसता है.

तीन

शराबी कहता है
बात सुनो
ऐसी बात
फिर कहीं नहीं सुनोगे.

चार

शराब होगी जहां
वहां आसपास ही होगा
चना चबैना.

पांच

शराबी कवि ने कहा
इस बार पुरस्कृत होगा
वह कवि
जो शराब नहीं पीता.

छह

समकालीन कवियों में
सबसे अच्छा शराबी कौन है?
समकालीन शराबियों में
सबसे अच्छा कवि कौन है?

सात

भिखारी को भीख मिल ही जाती है
शराबी को शराब.

आठ

मैं तुमसे प्यार करता हूं

शराबी कहता है
रास्ते में हर मिलने वाले से.

नौ

शराबी कहता है
मैं शराबी नहीं हूं

शराबी कहता है
मुझसे बेहतर कौन गा सकता है? (कृष्ण कल्पित ) 

सोमवार, 7 नवंबर 2011

प्रतीक्षा


मधुर प्रतीक्षा ही जब इतनी, प्रिय तुम आते तब क्या होता ?

मौन रात इस भाँति कि जैसे, को‌ई गत वीणा पर बज कर,
अभी-अभी सो‌ई खो‌ई-सी सपनों में तारों पर सिर धर
और दिशा‌ओं से प्रतिध्वनियाँ, जाग्रत सुधियों-सी आती हैं,
कान तुम्हारी तान कहीं से यदि सुन पाते, तब क्या होता ?

तुमने कब दी बात रात के सूने में तुम आनेवाले,
पर ऐसे ही वक्त प्राण मन, मेरे हो उठते मतवाले,
साँसें घूम-घूम फिर - फिर से, असमंजस के क्षण गिनती हैं,
मिलने की घड़ियाँ तुम निश्चित, यदि कर जाते तब क्या होता ?

उत्सुकता की अकुलाहट में, मैंने पलक पाँवड़े डाले,
अम्बर तो मशहूर कि सब दिन, रहता अपना होश सम्हाले,
तारों की महफ़िल ने अपनी आँख बिछा दी किस आशा से,
मेरे मौन कुटी को आते तुम दिख जाते तब क्या होता ?

बैठ कल्पना करता हूँ, पगचाप तुम्हारी मग से आती
रग-रग में चेतनता घुलकर, आँसु के कण-सी झर जाती,
नमक डली-सा गल अपनापन, सागर में घुलमिल-सा जाता,
अपनी बाहों में भरकर प्रिय, कण्ठ लगाते तब क्या होता ?

- हरिवंशराय बच्चन