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गुरुवार, 29 अप्रैल 2010

घरोंदा

हकीकत कुछ और कहती है ,
आकड़ा कुछ और कहता है!
वो अब फुटपाथ पे नहीं
फईलो के घर मै रहता है !

बुधवार, 28 अप्रैल 2010

पहल

धुंद मै अन्धकार मै पर्दों में दिवार मै
कही छिपता है , सच  कभी
  झूट के अम्बार मै ! 
सच को सच से मिलाते  है
 कुछ  य़ू झूट से  निगाह मिलाते है
हम ,की डरते नहीं कुछ भी अंजाम हो
अब फरेब से परदे उठाते है हम !
किसी को तो करना ही होगा कुछ
  ये सोच के एक कदम अब उठाते है हम ,

सोमवार, 26 अप्रैल 2010

प्राथमिक शिक्षा पर अपेक्षा से कम आंवटित हुआ है


|| शिरीष खरे ||
बजट-2010 में प्राथमिक शिक्षा पर अपेक्षा से बहुत कम आंवटित हुआ है। अपेक्षा यह की जा रही थी कि इस बार कम से कम 71,000 करोड़ रूपए आंवटित होंगे, मगर प्राथमिक शिक्षा में 26,800 करोड़ रूपए से 31,300 करोड़ रूपए की ही बढ़ोतरी हुई है। चाईल्ड राईटस एण्ड यू द्वारा देश के सभी बच्चों के लिए निशुल्क और बेहतर गुणवत्ता वाली शिक्षा की मांग की जाती रही है, संस्था यह मानती है कि अभी तक बच्चों के लिए जो धन खर्च किया जाता रहा है वह जरूरत के हिसाब से बहुत कम है। ऐसा इसलिए भी क्योंकि संस्था का 6700 समुदायों में काम करने का तर्जुबा यह कहता है कि देश में गरीबी का आंकलन वास्तविकता से बहुत कम हुआ है। बहुत से बच्चे ऐसे हैं जो गरीबी रेखा के ऊपर होते हुए भी हाशिए पर हैं। यानि एक तो हम गरीबी को वास्तविकता से बहुत कम आंक रहे हैं और उसके ऊपर आंकी गई गरीबी के हिसाब से भी धन खर्च नहीं कर रहे हैं, ऐसे में स्थितियां सुधरने की बजाय बिगड़ेगी ही।
हालांकि चाईल्ड राईटस एण्ड यू ने बजट 2010 में महिला और बाल विकास की योजनाओं के आंवटन में बढ़ोतरी करने और 1,000 करोड़ रूपए के राष्ट्रीय सामाजिक सुरक्षा कोष बनाए जाने का स्वागत किया है। मगर संस्था के मुताबिक सरकार को बच्चों की गरीबी दूर करने के लिए और अधिक निवेश करने की जरूरत थी। ऐसा इसलिए क्योंकि सरकारी आकड़ों के लिहाज से देश की 37.2% आबादी गरीबी रेखा के नीचे है। जो दर्शाती है कि देश में गरीबी बहुत तेजी से बढ़ रही है। यानि जितना हम सोचते हैं उससे कहीं ज्यादा बच्चे गरीबी में जीने को मजबूर हैं। चाईल्ड राईटस एण्ड यू की सीईओ पूजा मारवाह यह मानती है कि “बच्चों की गरीबी उनका आज ही खराब नहीं करती है बल्कि ऐसे बच्चे बड़े होकर भी वंचित के वंचित रह जाते हैं।´´ इसलिए सरकार को अपने बजट में बच्चों की बढ़ती संख्या को ध्यान में रखते हुए उनके खर्च में उचित बढ़ोतरी करनी चाहिए थी। मगर भारत सरकार जीडीपी का तकरीबन 3% शिक्षा और तकरीबन 1% स्वास्थ्य पर खर्च करती है, जबकि विकसित देश जैसे अमेरिका, बिट्रेन और फ्रांस अपने राष्ट्रीय बजट का 6-7% सार्वजनिक शिक्षा और स्वास्थ्य पर खर्च करते हैं।
हमारे देश में शिक्षा के अधिकार का कानून है जो देश के सारे बच्चों को निशुल्क और बेहतर गुणवत्ता वाली शिक्षा पहुंचाने के मकसद से तैयार हुआ है। मगर सार्वजतिक शिक्षा की बिगड़ती स्थितियों को देखते हुए, बहुत से गरीब बच्चे स्कूल से दूर हैं। ऐसे में अगर बजट में शिक्षा पर अपेक्षा से बहुत कम खर्च किया जाएगा तो शिक्षा के अधिकार का कानून बेअसर ही रहेगा। आज देश के बच्चों ही हालत यह है कि लगभग 40% बस्तियों में प्राथमिक स्कूल नहीं हैं। 48% बच्चे प्राथमिक स्कूलों से दूर हैं। 1.7 करोड़ बाल मजदूर हैं। 5 साल से कम उम्र के आधे बच्चे सामान्य से कमजोर हैं। 77% लोग एक दिन में 20 रूपए भी नहीं कमा पाते हैं। ऐसे में अगर सरकार बच्चों के स्वास्थ्य और शिक्षा पर उचित खर्च नहीं करेगी तो एक शिक्षित और स्वस्थ्य भारत के भविष्य से जुड़ी उम्मीदों पर पानी फिर जाएगा।
- शिरीष खरे ‘चाईल्ड राईटस एण्ड यू’ के ‘संचार-विभाग’ से जुड़े हैं।

गुरुवार, 15 अप्रैल 2010

कमजोरी के अन्दर ,छिपी शक्ति


भारतीय युवाओ के चहेते युवा लेखक चेतन भगत के तीसरे उपन्यास ‘द थ्री मिस्टेक्स ऑफ माय लाइफ’ पर भी अब फिल्म बनने जा रही है ,भले ही  विधु  विनोद चोपड़ा ने थ्री  इंडियेट्स का क्रेडिट चेतन को न दिया हो, तो  कोई बात नहीं पर  चेतन  वोलिबुड के फिल्मकारो के बीच जो इतना लोकप्रिय होते जा रहे है , जो अब अभिषेक कपूर अपने निर्देसन मै नई फिल्म करने जा रहे है जो उपन्यास ‘द थ्री मिस्टेक्स ऑफ माय लाइफ’ पर आधारित होगी, खबर यह भी है की फरहान अख्तर ने थ्री मिस्टेक्स इन माई लाइफ की राइट्स चेतन भगत से खरीद लिए है .फिलहाल स्क्रिप्ट लिखने पर काम चल रहा है। तो  चलते है चेतन की लिखी उन गलतियों पर जो भारतीय युवा के अन्दर बेठी इस्थितीयो को बहार लाती है की किस तरह से एक व्यवसायोन्मुख युवक गोविन्द अपनी जिंदगी को ख़त्म करने की कोसिसे करता रहता है ,पर कोसिसे  कामयाब नहीं हो पाती  और फिर वह चेतन को अपनी जिंदगी की तीन घटनाये बताता है जिन्हें वह अपनी तीन गलतियों के रूप मै देखता है ! पहली गलती जो वह बताता है वो यह की अपने कछुआ चाल चल रहे व्यवसाय को बढाने की अपनी उची छलांग को बताता है तो, दूसरी गलती मै प्यार मै युवाओ पर सेक्स का  किस तरह हावी हो जाना और तीसरी गलती मै मोके पर जो चोका नहीं मार पाटा ,यानि सही  समय पर सही फेसला न लेना इसको वह बताता है !  और देखा जाये तो चेतन ने इन तीन गलतियों मै नई पीड़ी के यूवा की सारी  परेसनिया  जिनसे ,उसे जूझना पड़ता है  उसे समेट दिया है !मै आप लोगो मै से किसी को नहीं ले रहा और अगर मै अपनी बात करू जो आप पर भी कही न कही लागु होती है ,की आज के दोर मै किसी भी कार्य छेत्र के युवा को कही न कही इन जेसी परेसनियो का सामना करना पड़ता है ! जिस तरह से इसमे मुख्य पढ़े जाने वाले पात्र अली को हाईपर-रिपलैक्स  बीमारी से ग्रस्त बताया है ,और इसके बाबजूद भी वह ओबर की चार गेंदों मै छक्के लगता है यह भी इस प्रकार के युवा वर्ग के लिए प्रेरणा से कम नहीं ! वेसे इस बीमारी से ग्रस्त लोगो की सोचने की शक्ति पूरी तरह से ख़त्म हो जाती है ,और वो अपने सामने आने वाली चीज़ का वेसा ही ज़वाब देते है जैसे वह सवाल कर रही है !और अली भी वेसा ही करते हुए अपने और आने वाली तेज़ गेंद को उतनी ही तेज़ी से वापस भेजता है ! और चेतन ने जिस तरह का चित्रण किया है वो आज के युवा वर्ग को अपनी  कमजोरी को अपनी शक्ति बनाने के लिए प्रेरित कर रहा है .बहुत ,बहुत बधाई चेतन 

बुधवार, 14 अप्रैल 2010

एक थे इंजीनिअर ,अश्फाक और आज भी है

बात निकली एक दिन बेठे २ भोपाल के इंजीनिअर छात्रों की ,वेसे दिखने मै बहुत ही शांत और सुशील दिखने की कोशिस करते है ,पर क्या करे उनकी रोज मर्रा की तनाब और भाग दोड़ भरी जिंदगी ........खेर छोड़ो ये उनके लिए रोज की बात है वेसे मैंने उनकी यह तनाब से भरी लाइफ को बहुत करीब से देखा है जो मै आप से बाट रहा हु !सुबह होती है दोपहर होने से ठीक १ घंटे पहले उठ कर घडी की तरफ नजर जाती है ,क्योकि ये वक़्त के बड़े पाबंद होते है फिर सीधा उठकर कमरे मै टटोलते है रात की सिगरेट के बचे हुए ठुट नहीं मिलते तो कोई बात नहीं थोड़ी दूर पर एक ऐसा ठीकाना होता है जहा आसानी से सारी जरुरत की चीज़े मिल जाती है ,और वहा रोज रोज पेसे भी नहीं देने पड़ते क्योकि ये व्योहार  मै बड़े कुशल होते है! एसे ही एक व्यवहारकुशल छात्र से मेरी मुलाकात हुई भोपाल के रिहाएसी इलाके रचना नगर के मकान   नंबर ३०२ मै !इनका नाम था असफाक तनवीर मध्यप्रदेश के बलाघात मै इनकी बनाबट हुई  और इंजीनिअर बनने का सपना ले आया राजधानी भोपाल मै ,मेरी जब इनसे मुलाकात हुई तब इनकी तनाब से भरी इंजीनिरिंग का तीसरा साल चल रहा था ! और जब मुलाकात हुई तो रात के ठीक ११ बजकर ५ मिनिट हुए थे और ये रात वाली फ्री मोबाइल सेवा  का भरपूर उपयोग कर रहे थे इनसे बस हाय हेलो हुई जादा   परेसान करना मैंने भी ठीक नहीं समझा शायद किसी महिला मित्र से बहुत ही जरुरी मुद्दे पर बात कर रहे थे भाई मैंने तभी समझ लिया था की कितना तनाब झेलना पड़ता है .फिर दिन ,महींने, साल कब बीत गई पता ही नहीं चला ,ह़ा और एक बात जो मै बताना भूल ही गया जो इनकी य़ू.एस .पी थी ये कभी सिगरेट नहीं पीते थे .ह़ा ये अलग बात है की अगर आप पी रहे है तो आप से उसे बाटेंगे जरुर क्योकि इनका मन्ना था की अकेले सिगरेट पीना स्वास्थ के लिए हानिकारक होता है बस यही तो थी इनकी अदा जिस पर आप फ़िदा तो हो ही जायेंगे और मै तो ये कहूँगा की अगर इनके साथ कोई सोफ्ट वेअर कम्पनी का मालिक दोस्त बनकर इनके साथ   कुछ घंटे बैठ जाये तो अपनी कंपनी का सी .ई .ओ बना दे ! क्या करे  सख्सियत  ही ऐसी है ,अब और क्या कहे इनके बारे मै .ह़ा मै हमेशा इन्हें पठान कहकर पुकारता था जो इन्हें खूब भाता था और शायद आज भी पसंद हो ,कई तन्हाई भरी राते जो सिर्फ मेरे लिए थी इन्होने मेरे साथ बाईक पर सबार होकर भोपाल की सडको पर फ़ोकट गुजारी शायद ये इस इंजीनिअर  का धर्म था जो परेसानियो मै हमेशा अपने दोस्त के साथ रहने को कहता है ! खेर कुल मिलाकर ये एक मस्तमोला अल्लह के नेक बन्दे  थे उन दिनों और इस इंजीनिअर ने रचना नगर के ३०२ के अलवा भी भोपाल के दुसरे इलाको मै भी रहने मै मेरा साथ दिया धीरे धीरे वो वक़्त भी आ गया जिसका हर इंजीनियर  को इन्तजार रहता है ,अपनी बी ,ई  खत्म होने का ,मुझे ठीक से याद है पठान का सामान बस मै रखा जा रहा था और पठान अपने मस्ती भरे अंदाज मै अपने आसुओ को छुपाने की भरपूर कोशिस कर रहे थे पर इनकी ये कोशिस काम नही कर सकी बस की खिड़की से झाकते हुए हिलते हुए हाथ के साथ इनके आसू भी साफ़ दिखाई पड़ रहे थे ,और मै अपनी कोशिस मै कामयाब हो गया था !बस, निकल गई एक पूरी तरह से तैयार  इंजीनिअर को अपने साथ लेकर साथ ही निकल गया वो दोस्तों का हुजूम जो इन्हें रुखसत करने आया था बस कुछ छूटा तो बस पठान जो आज भी मेरे करीब है ! और इस समय पुणे मै अपने भविष्य को सवारने मै जी जान से लगे हुए है .! तुम्हारे लिए ......पठान  इसकी तो बनती है !  ये आप नहीं समझेंगे ये हमारी बात है  अश्फाक से संपर्क 09326505492

शनिवार, 10 अप्रैल 2010

सच्चे प्यार का नतीजा

मै नहीं जानता था या शायद समझना नहीं चाहता था की सच्चा प्यार क्या होता है , पर एक दिन योही उंगलियों ने की बोर्ड पर शरारत की और एक सर्च इंजन पर टाइप किया! रिजल्ट ऑफ़ true  लव और जो तस्बीर मेरे सामने थी  वो आपके सामने है !

गुरुवार, 8 अप्रैल 2010

पानी मै जहर

गया से महज़ चौंसठ किलोमीटर के फ़ासले पर है आमस प्रखंड का गांव भूपनगर, जहां के युवक इस बार भी अपनी शादी का सपना संजोए ही रह गए. कोई उनसे विवाह को राज़ी न हुआ. वजह है उनकी विकलांगता. इनके हाथ-पैर आड़े-तिरछे हैं, दांत झड़ चुके हैं, हड्डियां ऐंठ गई हैं. जवानी में ही लोग बूढ़े हो गये हैं. गांव के लोग बीमारी का नाम बताते हैं- फ्लोरोसिस. इलाज की ख़बर यह है कि हल्की सर्दी-खांसी के लिये भी इन्हें पहाड़ लांघ कर आमस जाना पड़ता है. भूदान में मिली ज़मीन की खेती कैसी होगी? बराए नाम जवाब है इसका. तो जंगल से लकड़ी काटना और बेचना यही इनका रोज़गार है. पहले लबे-जीटी रोड झरी, छोटकी बहेरा और देल्हा गांव में खेतिहर गरीब मांझी परिवार रहा करता था. बड़े ज़मींदारों की बेगारी इनका पेशा था. बदले में जो भी बासी या सड़ा-गला अनाज मिलता, गुज़र-बसर करते. भूदान आंदोलन का जलवा जब जहां पहुंचा तो ज़मींदार बनिहार प्रसाद भूप ने 1956 में इन्हें यहां ज़मीन देकर बसा दिया. और यह भूपनगर हो गया.



श्राप वाला पानी

आज यहां पचास घर है. अब साक्षरता ज़रा दीखती है, लेकिन पंद्रह साल पहले अक्षर ज्ञान से भी लोग अनजान थे और तब पहली बार लोगों को पता चला कि जिसे वे किसी श्राप या ऊपरी हवा समझ रहे थे, वह असल में पानी में फ्लोराइड की अधिकता के कारण होने वाली फ्लोरोसिस नामक बीमारी है. अचानक कोई लंगड़ा कर चलने लगा तो उसके पैर की मालिश की गयी. यह 1995 की बात है. ऐसे लोगों की तादाद बढ़ी तो ओझा के पास दौड़े. ख़बर किसी तरह ज़िला मुख्यालय पहुंची तो जांच दल के पहुंचते- पहुंचते 1998 का साल आ लगा था. तब तक ढेरों बच्चे, जवान कुबड़े हो चुके थे. प्रशासन ने लीपापोती की कड़ी में एक प्राइमरी स्कूल क़ायम कर दिया. चिकित्सकों ने जांच के लिए यहां का पानी प्रयोगशाला भेजा. जांच के बाद जो रिपोर्ट आई उससे न सिर्फ़ गांववाले बल्कि शासन-प्रशासन के भी कान खड़े हो गए. लोग ज़हरीला पानी पी रहे हैं. गांव फलोरोसिस की चपेट में हैं. पानी में फलोराइड की मात्रा अधिक है. इंडिया इंस्टिट्यूट आफ़ हाइजीन एंड पब्लिक हेल्थ के इंजीनियरों ने भी यहां का भूगर्भीय सर्वेक्षण किया. जल स्रोत का अध्ययन कर रिपोर्ट दी थी. और तत्कालीन जिलाधिकारी ब्रजेश मेहरोत्रा ने गांव के मुखिया को पत्र लिखकर फ़लोरोसिस की सूचना दी थी. मानो इस घातक बीमारी से छुटकारा देना मुखिया बुलाकी मांझी के बस में हो! रीढ़ की हड्डी सिकुड़ी और कमर झुकी हुई है उनकी. अब उनकी पत्नी मतिया देवी मुखिया हैं. शेरघाटी के एक्टिविस्ट इमरान अली कहते हैं कि राज्य विधान सभा में विपक्ष के उपनेता शकील अहमद ख़ां जब ऊर्जा मंत्री थे तो सरकारी अमले के साथ भूपनगर का दौरा किया था. उन्होंने कहा था कि आनेवाली पीढ़ी को इस भयंकर रोग से बचाने के लिए ज़रूरी है कि भूपनगर को कहीं और बसाया जाए. इस गांव बदर वाली सूचना ज़िलाधिकारी दफ्तर से तत्कालीन मुखिया को दी गयी थी कि गांव यहां से दो किलो मीटर दूर बसाया जाना है. लेकिन पुनर्वास की समुचित व्यवस्था न होने के कारण गांववालों ने ‘मरेंगे, जिएंगे, यहीं रहेंगे’ की तर्ज़ पर भूपनगर नहीं छोड़ा.





असमय बुढ़ापा

इस बीमारी में समय से पहले रीढ़ की हड्डी सिकुड़ जाती है, कमर झुक जाती है और दांत झड़ने लगते हैं. दैनिक हिंदुस्तान के स्थानीय संवाददाता एस के उल्लाह ने बताया कि कुछ महीने पहले सरकार ने यहां जल शुद्धिकरण के लिए संयत्र लगाया है. लेकिन सवाल यह है कि जो लोग इस रोग के शिकार हो चुके हैं, उनके भविष्य का क्या होगा? आखिर प्रशासन की आंख खुलने में इतनी देर क्यों होती है. भारत में पहली बार 1930 में आंध्र के नल्लौर में फ्लोरोसिस का पता चला था. उसके बाद सरकार की नींद टूटी. लेकिन बदहवास और लूट तंत्र में विश्वास रखने वाली सरकारों ने लोगों को उनके ही हाल पर छोड़ दिया. सरकारी आंकड़ों पर यकीन करें तो आज की तारीख में देश के 20 राज्यों के करीब 200 जिले पानी में फ्लोराइड की अधिकता की मार झेल रहे हैं. कम से कम 6 करोड़ 66 लाख 20 हजार लोगों की आबादी इस पानी के कारण स्थाई, अस्थाई अपंगता का शिकार हो चुकी है. जिसमें 60 लाख की आबादी तो उन बच्चों की है, जो 14 साल से भी कम उम्र के हैं. बिहार में कम से कम 11 जिलों में लोग फ्लोराइड की अधिकता के कारण असमय बुढ़ापा और बीमारियों का शिकार हो रहे हैं.





बेपरवाह सरकार

सरकारें लगातार दावा करती हैं कि वे फ्लोराइड की अधिकता से मुक्ति दिलाने के लिये योजनायें बना रही हैं, भूजल शुद्धिकरण प्लांट लगा रही हैं. योजनायें बनती भी हैं लेकिन फिर बंद कमरों में बनने वाली योजनायें बंद कमरों में ही दम तोड़ देती हैं. झारखंड के कोडरमा घाटी में बसे गांव मेघातरी, उससे सटे विस्नीटिकर और करहरिया को विकास का मुखौटा तो मिल गया, हाल ही में बिजली भी पहुंची लेकिन सालों पुराने फ्लोराइड की अधिकता का अभिशाप आज यहां जनजीवन पर कुंडली मारे बैठा है. आलम यह है कि गांव के दर्जनों बच्चे और बुजुर्ग विकलांग हो चुके हैं. कुछ पढ़े-लिखे ग्रामीणों ने यह दर्द प्रशासन तक पहुंचाया पर कोई परिणाम नहीं निकला. बैसाखी पर लटके युवाओं और बच्चों को देखकर इनका दिल रोता है. जिला मुख्यालय कोडरमा से सिर्फ 18 किलोमीटर दूर मेघातरी पंचायत की आबादी करीब ढाई हजार है. किसी जमाने में यहां माइका की अधिकता के कारण गांव के युवा क्षयरोग के कारण अपनी जान गवां रहे थे. मौत की रफ्तार इतनी तेज़ कि गांव में एक के बाद एक युवाओं की मौत होती रही और गांव विधवाओं की बस्ती कहलाने लगा.लेकिन अब यहां जल में फ्लोराइड की मात्रा ज्यादा होने के कारण ग्रामीण विकलांग होते जा रहे हैं और तीन साल के बच्चों तक के शरीर विकृत हो चुके हैं. पानी की सुविधा के लिए गांव में कई चापानल भी लगाये गये पर स्थिति नहीं सुधरी. गांव में रहने वाले 28 साल के कुन्दन कहते हैं- “दो साल पहले अचानक स्थिति बिगडी जिसके बाद कई जगहों पर इलाज करवाया पर ठीक नहीं हो सका.”



कोई उम्मीद बर नहीं आती...

मेघातरी में सत्येन्द्र सागर सिंह का 11 वर्षीय पुत्र रीतिक, जगदीश प्रसाद का 4 वर्षीय पुत्र राजू, सरयू साव का 6 वर्षीय पुत्र दिवाकर पैरों से विकलांग हो चुके हैं. नामों की एक लंबी सूची है, जिन्हें फ्लोराइड की अधिकता ने कहीं का नहीं छोड़ा. सामाजिक कार्यकर्ता और मेघातरी निवासी सत्येन्द्र सिंह सागर ने पानी के कारण बच्चों के विकलांग होने की जानकारी सरकारी स्तर पर विभाग को और उच्चाधिकारियों को इसकी जानकारी दी पर अब तक कोई कार्यवाई नहीं हुई. कोडरमा के एसीएमओ डॉक्टर एमए अशरफी कहते हैं- “यह विटामिन डी या हार्मोन की कमी के कारण भी हो सकता है. पानी में फ्लोराइड की ज्यादा मात्रा भी कारण हो सकता है.” डॉक्टर अशरफी का दावा है कि इसकी जांच के लिये एक टीम गठित की जायेगी, जो जल्द ही जांच कर रिपोर्ट देगी और तब इनका इलाज करवाया जा सकेगा. हालांकि राज्य के सर्वाधिक फ्लोराइड ग्रस्त पलामू जिले के अनुभव देखते हुए यकीन नहीं होता कि मेघातरी के लोगों को मुक्ति मिलेगी. जिला मुख्यालय डालटनगंज से लगे हुए चियांकी, चुकरु के इलाके से लेकर गढ़वा और फिर उत्तर प्रदेश के सोनभद्र और छत्तीसगढ़ के रायगढ़ तक फैली फ्लोराइड पट्टी को लेकर कई योजनायें बनीं, उन पर लाखों-करोड़ों रुपये खर्च भी किये गये. लेकिन इन योजनाओं की हकीकत देखनी हो तो आप चुकरु में देख सकते हैं और रायगढ़ में भी.
शहरोज़ (गया, बिहार), संजीव समीर (कोडरमा, झारखंड
इंडिया वाटर पोर्टल

सोमवार, 5 अप्रैल 2010

प्यासा




ये कूचे ये नीलामघर दिलक़शी के

ये लुटते हुए कारवां ज़िंदगी के

कहां हैं कहां हैं मुहाफ़िज़ ख़ुदी के

सना-ख़्वाने-तक़दीसे-मशरिक़ कहां हैं..





ये पुरपेंच गलियां ये बेख़्वाब बाज़ार

ये गुमनाम राही ये सिक्कों की झंकार

ये इस्मत के सौदे ये सौदों पे तकरार

सना-ख़्वाने-तक़दीसे-मशरिक़ कहां हैं..





तअफ्फुन से पुरनीम रौशन ये गलियां

ये मसली हुई अधखिली ज़र्द कलियां

ये बिकती हुई खोखली रंगरलियां

सना-ख़्वाने-तक़दीसे-मशरिक़ कहां हैं..





वो उजले दरीचों में पायल की छनछन

तऩफ्फ़ुस की उलझन पे तबले की धनधन

ये बेरूह कमरों में खांसी की धनधन

सना-ख़्वाने-तक़दीसे-मशरिक़ कहां हैं..





ये गूंजे हुए कहकहे रास्तों पर

ये चारों तरफ भीड़ सी खिड़कियों पर

ये आवाज़ें खिंचते हुए आंचलों पर

सना-ख़्वाने-तक़दीसे-मशरिक़ कहां हैं..





ये फूलों के गजरे ये पीकों के छींटे

ये बेबाक़ नज़रें ये गुस्ताख़ फ़िक़रे

ये ढलके बदन और ये मदक़ूक़ चेहरे

सना-ख़्वाने-तक़दीसे-मशरिक़ कहां हैं..





ये भूखी निगाहें हसीनों की जानिब

ये बढ़ते हुए हाथ सीनों की जानिब

लपकते हुए पांव ज़ीनों की जानिब

सना-ख़्वाने-तक़दीसे-मशरिक़ कहां हैं..





यहां पीर भी आ चुके हैं जवां भी

तनूमंद बेटे भी अब्बा मियां भी

ये बीवी भी है और बहन भी है मां भी

सना-ख़्वाने-तक़दीसे-मशरिक़ कहां हैं..





मदद चाहती है ये हव्वा की बेटी

यशोदा की हमजिंस राधा की बेटी

पयंबर की उम्मत ज़ुलेख़ा की बेटी

सना-ख़्वाने-तक़दीसे-मशरिक़ कहां हैं..





ज़रा मुल्क़ के रहबरों को बुलाओ

ये कूचे ये गलियां ये मंज़र दिखाओ

सना-ख़्वाने-तक़दीसे-मशरिक़ को लाओ

सना-ख़्वाने-तक़दीसे-मशरिक़ कहां हैं..

रविवार, 4 अप्रैल 2010

शादी के तीनों नियम, पारम्परिक रूप से, संक्षेप में इस प्रकार हैं:


                          

सचिन श्रीवास्तव
1. यदि बीवी हंस रही है, तो हंसती ही रहेगी और अगर रो रही है तो रोती ही रहेगी जब तक कि टीवी पर चलने वाला            सीरियल खत्म न हो जाए।

2. बीवी के खुश रहने की दर मियां के दुखी होने के वियुत्क्रमानुपाती होती है और उसकी दिशा दुख के ठीक उलट होती है।

3. प्रत्येक गुजरते दिन के साथ मियां के अधिकारों में कटौती होती जाती है, जो बीवी की ओर स्थानांतरित होते रहते हैं।

सभी नियम टेस्टेड पिछले एक महीने में बिना किसी अपवाद के।

१५०० से शादी


वो कहते है न जब पागलपन और दिमाग का तालमेल होता है तो वह सबसे खतरनाक होता है ,ऐसा ही कुछ हुआ करता था या हो रहा है पता नहीं पर वो, लगातार वही करता जा रहा है जो उसने उन दिनों किया शायद आपकी उत्सुकता बदने लगी हो उसके द्वारा किये हुए खतरनाक काम को जान्ने मै हा उसने भी कुछ ऐसा किया पर सिर्फ अपने साथ और अब भी कर रहा है ,तो शुरु हुआ उसका उन दिनों का पागलपन एक नंबर से 1500  हा यही नंबर है ये एक टेलिकॉम कम्पनी का कस्टमर केयर नंबर है यही काम किया करता था वो ,और आठ घंटे यही कहता था मै आपकी क्या सहायता कर सकता हु !बात ११ जनबरी की है तंग आकर दिन काट लिया था बस सिफ्ट ख़त्म होने वाली थी तभी फ़ोन धन घनाय हेलो मै आपकी की क्या सहायता कर सकता हु दूसरी तरफ से आवाज़ आई मै ,,,,,,,,, बोल रही हु मेरा बेलेंस  अचानक कट गया है उसने कहा ,मेम यहाँ सिर्फ लेडलाइन की प्रोब्लम शोर्टआउट हो सकती है आप इस नंबर पर कॉल करिए ,प्लीज़ आप ही करवा दीजिये मै बहुत परेसान हु इतनी मुस्किल से बेलेंस करवाया था और अब इतनी दूर बापस भी नहीं जा सकती .उसने कुछ सोचा और कहा मेम आपका नाम और नंबर मुझे बता दीजिये हा हा लिखिए नंबर है ....... और .....नाम .....है,,,,,,ओके धन्यवाद और हा शायद आपकी तबियत कुछ ठीक नहीं है हा मेम पर अचानक टीम लीडर के अजाने से ओके मेम कॉल करने के लिए धन्यबाद .सिफ्ट खत्म होती है औए वो अपने ऑफिस के बराबर वाली शॉप से उसका बेलेंस करवा देता है क्योकि वह अपने द्वारा रिज बोले गए अलफ़ाज़ को सही करना चाहता था ! बस यही से उसके  खतरनाक काम की सुरुआत हो गई उसने अगले दिन जा कर मेम को कॉल किया और कहा मेम क्या आपकी प्रोब्लम सोल्फ हो गई जी ,हो गई पर एक बात है जिसके लिए मै आपको धन्यबाद देना जरुरी समझती हु ,वह क्या ,वह ये की आपने मेरा बेलेंस खुद से करवाया है न जी मै कुछ समझा नहीं ,क्योकि मेने आपके दिए हुए नंबर पर कॉल की थी वहा से उन्होंने कहा की आपकी प्रोब्लम को सोल्फ होने मै २४ घंटे लगेगे सुच बताओ हा मैंने ये इसलिए किया क्योकि आपकी सहायता करना मेरा न न मेरा मतलब आप सभी कस्टमर की सहायता करना मेरा काम है ,हा हा आप बहुत सोचते है न दुसरो के बारे मै नहीं तो मै ,,,,,,,,ओके सर है मै बाद में आपसे बात करता हु आपको कोई प्रोब्लम तो नहीं है न नहीं ,नहीं आप कभी भी करिए ओके बाए. फिर क्या था लड़के का प्यार बढ़ने लगा ऐसा वह सोचता था!
पर वह नहीं जानता था की उसकी खुशिया वो धीरे धीरे खोता जा रहा है एक दिन बातो ही बातो मै उसने उससे पुछा तुम्हारे घर मै कोन कोन है लड़की पापा और मै कहकर चुप हो गई हेलो ,हेलो हा सुन रही हु बोलो न आगे क्या बोलू जब कोई और है नहीं तो ,अरे मम्मी वो इस दुनिया मै नहीं है मेरा भाई .और छोटी बहन बहार पढाई कर रहे है ,बस इस दिल के रहनुमा ने सोच लिया की इसके अकेलेपन को मै कभी अकेलापन नहीं रहने दूंगा !और शादी का प्रस्ताब रख दिया .दिन बीते दोनों के घर वाले एक दुसरे से मिले बस बात एक जगह अटक गई ,जो इन दो सालो मै इसने नहीं सोची थी वह ये की इसने अपने करियर पर ध्यान देना छोड़ दिया था जहा पहले था वही था !फिर दूर शुरु हुआ एक दुसरे को समझाने का जिसमे लडकिय अक्सर निपुड मणि जाती है वही हुआ हस्ते हस्ते एक इन कह दिया जाओ करलो और किसी और से शादी मेरी तो चुकी है .लड़की ने पुछा किस्से ,तुम से और मै दूसरी शादी नहीं कर सकता हा पर तुम पहली शादी कर लो .और एक दिन नही .उस तारीख को उस लड़की ने शादी कर ली जिस दिन उसने उस लड़की की दर्द भरी आवाज़ को सुनकर सदी का प्रस्ताब रखा था ...तो यह खतरनाक काम किया उसने और शायद अब नहीं करेगा यह मेरी इक्छा पर विशवास बिलकुल नहीं  १५०० से शादी

मदहोश पत्रिका



माँ दारू देवी की असीम अनुकंपा से पूरे नशे मे टुन्न होकर हुक्के और माल के सनिध्य मैं हमे आज हर्षित होने का अवसर मिला है क्योंकि हमारी बिगड़ी औलाद ..........







चिरंजीव दुली चंद


कूपत्र श्री मालबोरो






एवं






सौ. बीडीकुमारी देतैनेद


कुपुत्र्ी श्री गोल्ड  फ्लेक  






विवाह बंधन मे बँधने जा रहे है, आप सभी से अनुरोध है की इस पावन अवसर पर पधारे और भरपूर उत्पात मचाकर अपनी उपस्थिति को सार्थक बनाएँ बारात ब्यावरा की "देसी दारू की भट्टी" से निकलकर निकटवर्ती "अँग्रेज़ी शराब की दुकान" की ओर रात 1 बजे के बाद प्रस्थान करेगी ........






पान - सुपारी :-- मेरे भैया की शादी में ज़लूल-ज़लूल आना...........






स्वगातोत्सुक :-


विल्स , उल्त्र  मिल्ड , रोयल इसटेग,


ग्रीन  लाबेल , जोह्न्न्य  वालकर






दर्शनाभिलाशी


ओल्ड  मोंक , 8 पीएम , मेक  डोवेल ,


ठुन्देर्बोल्ट , हय्वार्ड  5000,


किन्ग्फिशेर . 






विनीत


भांग, ठंडई, ५०२ पताका छाप बीडी, 

शनिवार, 3 अप्रैल 2010

नजरिया

एक पुराना किस्सा है , एक बाग़ मै कुछ लोग एक गुलाब  के फूल को देखकर लगातार बहस मै लगे हुए थे कोई कहता ये थोडा सुखा सा है कोई कहता है थोडा और बड़ा होता तो जादा खूब सूरत दिखाई देता, तो कोई उसकी सुन्दरता का कायल हुआ जा रहा था तभी बहा ओसो का आना हुआ और उन्होंने उस गुलाब को देखकर कहा की आप लोग यह बात अपने अपने नजरिये से कह रहे है दरअसल  गुलाब का फूल तो बही रहेगा जो उसकी तासीर मै है तब सभी लोग समझ गए की ओसो क्या कहना चाह रहे है दरअसल गुलाब की तासीर सुन्दरता है तो बह लाख आलोचनाओ के बाद भी बही रहेगा जहा बह है ! और यह नजरिया आपको कही भी दिखाई दे सकता है बशर्ते आप मै दिमाग होना जरुरी है अभी हरिद्वार मै कुम्भ चल रहा है और बहा लाखो लोग प्रति दिन स्नान के लिए जा रहे है .हसी के सहंसा राजू श्रीवास्तव भी बहा पहुचे और बहा से कुछ इस तरह का नजरिया लेकर आये ,चारो तरफ लोग नहा रहे है कोई धोती मै कोई कच्छा पहने हए ,सभी को ठण्ड लग रही है लेकिन मुह पर एक ही नाम जय गंगा मैया तभी एक आदमी अपने आप को सँभालते हुए आधा अन्दर आधा बहार और स्नान के बाद किसी नागा साधू को देखता तभी उसकी नजर एक आधे नागे पर पड़ती है और तुरंत बह उनके पेरो मै गिर जाता है और कहता है बाबा असीरबाद दीजिये नागा कहता अरे हट यहाँ से नहीं बाबा आसीरबाद दीजिये अरे हट जा मै नागा नहीं हु मेरी टआबिल कोई उठा कर ले गया है तो कुछ इस तरह भी हो जाता है और एक नजरिया बन जाता है

शुक्रवार, 2 अप्रैल 2010

बद से बदतर हालत

ओधोगीकरण ने भले ही हमें आगे लाके खड़ा कर दिया है लेकिन इसी ओधोगीकर ने किसानो के हालत को बद से बदतर कर दिया है अगर हम बात करे दिल्ली से सटे आस पास के इलाको की तो शायद पता चलेगा की कितनी तेजी के साथ किसानो के हाथो से खेती योग्य ज़मीन फिसलती जा रही है और जहा तक मेरा मानना है की ये आने वाले गहरे संकट का संकेत है ,जिसके दूरगामी परिणाम हमें साफ़ नहीं दिखाई दे रहे है अगर इन सबका जिम्मेदार ठहराना है तो .बढ़ते उधोग जो तेजी से बढ़ते हुए जमीनों को निगलते जा रहे है या फिर वो किसान जो रातो रात करोडपति बनने की चाह मै अपनी खेतिहर ज़मीन बेचने पर बाध्य हो रहा है ....

गुरुवार, 1 अप्रैल 2010

ये रात का इकरार


ये रात की तन्हाई का आलम
और ज़हन मे तुम्हारे ख्यालों का मौसम
दिल मे तुम्हारी यादें और आँखों मे तुम्हारे ख्वाबना नींद आती है ,ना आँख खोलने को जी चाहता है,डर लगता हैकहीं टूट ना जाएवो ख्वाब, जो अरसे से संजोया है…बिखर ना जाए वो यादों के मोती ,जिन्हे दिल की गहराइयों मे पिरोया है…टूट ना जाए ख्यालों का सिलसिला जिसे पल-पल जोड़कर दिल मे सजोया है…बीत ना जाए ये तन्हाई का मौसमजिसने तुम्हारे प्यार की रिमझिम बरसात मे भिगोया है…कि आ जाओ हम इकरार करते हैं……….आज कहते हैं कि हम तुमसे प्यार करते हैं…..तुमसे प्यार करते है……..

चलते-चलते



“तन्हा है मन इस ख्याल सेनही मिलोगे अब तुम मुझेगुज़र जाएगी ये ज़िंदगी यूँ हीतन्हाइयों में चलते-चलते…आज रोशनी कितनी अँधेरी है,ये सवेरा कितना काला है,सूरज भी छिप गया है कहींमेरे साथ जलते-जलते…एक उम्मीद फिर भी जिंदा हैमेरे दिल में आज भी,इस छोटी सी दुनिया में तुम,मिलोगे कहीं फिर चलते-चलते