इन गलियों को लिखने का मकसद कुछ खास है क्योकि ये गलिया ले जाती है आपको उन पक्की सडको पर जहा आप भूल जाते है इन गलियों को और न कहिएगा की यही सब लिखते रहते हो .यही सब तो है वो गलियां............अब उसके शहर में ठहरें के कूच कर जाएँ फ़राज़ आओ सितारे सफ़र के देखते हैं
बुधवार, 14 अप्रैल 2010
एक थे इंजीनिअर ,अश्फाक और आज भी है
बात निकली एक दिन बेठे २ भोपाल के इंजीनिअर छात्रों की ,वेसे दिखने मै बहुत ही शांत और सुशील दिखने की कोशिस करते है ,पर क्या करे उनकी रोज मर्रा की तनाब और भाग दोड़ भरी जिंदगी ........खेर छोड़ो ये उनके लिए रोज की बात है वेसे मैंने उनकी यह तनाब से भरी लाइफ को बहुत करीब से देखा है जो मै आप से बाट रहा हु !सुबह होती है दोपहर होने से ठीक १ घंटे पहले उठ कर घडी की तरफ नजर जाती है ,क्योकि ये वक़्त के बड़े पाबंद होते है फिर सीधा उठकर कमरे मै टटोलते है रात की सिगरेट के बचे हुए ठुट नहीं मिलते तो कोई बात नहीं थोड़ी दूर पर एक ऐसा ठीकाना होता है जहा आसानी से सारी जरुरत की चीज़े मिल जाती है ,और वहा रोज रोज पेसे भी नहीं देने पड़ते क्योकि ये व्योहार मै बड़े कुशल होते है! एसे ही एक व्यवहारकुशल छात्र से मेरी मुलाकात हुई भोपाल के रिहाएसी इलाके रचना नगर के मकान नंबर ३०२ मै !इनका नाम था असफाक तनवीर मध्यप्रदेश के बलाघात मै इनकी बनाबट हुई और इंजीनिअर बनने का सपना ले आया राजधानी भोपाल मै ,मेरी जब इनसे मुलाकात हुई तब इनकी तनाब से भरी इंजीनिरिंग का तीसरा साल चल रहा था ! और जब मुलाकात हुई तो रात के ठीक ११ बजकर ५ मिनिट हुए थे और ये रात वाली फ्री मोबाइल सेवा का भरपूर उपयोग कर रहे थे इनसे बस हाय हेलो हुई जादा परेसान करना मैंने भी ठीक नहीं समझा शायद किसी महिला मित्र से बहुत ही जरुरी मुद्दे पर बात कर रहे थे भाई मैंने तभी समझ लिया था की कितना तनाब झेलना पड़ता है .फिर दिन ,महींने, साल कब बीत गई पता ही नहीं चला ,ह़ा और एक बात जो मै बताना भूल ही गया जो इनकी य़ू.एस .पी थी ये कभी सिगरेट नहीं पीते थे .ह़ा ये अलग बात है की अगर आप पी रहे है तो आप से उसे बाटेंगे जरुर क्योकि इनका मन्ना था की अकेले सिगरेट पीना स्वास्थ के लिए हानिकारक होता है बस यही तो थी इनकी अदा जिस पर आप फ़िदा तो हो ही जायेंगे और मै तो ये कहूँगा की अगर इनके साथ कोई सोफ्ट वेअर कम्पनी का मालिक दोस्त बनकर इनके साथ कुछ घंटे बैठ जाये तो अपनी कंपनी का सी .ई .ओ बना दे ! क्या करे सख्सियत ही ऐसी है ,अब और क्या कहे इनके बारे मै .ह़ा मै हमेशा इन्हें पठान कहकर पुकारता था जो इन्हें खूब भाता था और शायद आज भी पसंद हो ,कई तन्हाई भरी राते जो सिर्फ मेरे लिए थी इन्होने मेरे साथ बाईक पर सबार होकर भोपाल की सडको पर फ़ोकट गुजारी शायद ये इस इंजीनिअर का धर्म था जो परेसानियो मै हमेशा अपने दोस्त के साथ रहने को कहता है ! खेर कुल मिलाकर ये एक मस्तमोला अल्लह के नेक बन्दे थे उन दिनों और इस इंजीनिअर ने रचना नगर के ३०२ के अलवा भी भोपाल के दुसरे इलाको मै भी रहने मै मेरा साथ दिया धीरे धीरे वो वक़्त भी आ गया जिसका हर इंजीनियर को इन्तजार रहता है ,अपनी बी ,ई खत्म होने का ,मुझे ठीक से याद है पठान का सामान बस मै रखा जा रहा था और पठान अपने मस्ती भरे अंदाज मै अपने आसुओ को छुपाने की भरपूर कोशिस कर रहे थे पर इनकी ये कोशिस काम नही कर सकी बस की खिड़की से झाकते हुए हिलते हुए हाथ के साथ इनके आसू भी साफ़ दिखाई पड़ रहे थे ,और मै अपनी कोशिस मै कामयाब हो गया था !बस, निकल गई एक पूरी तरह से तैयार इंजीनिअर को अपने साथ लेकर साथ ही निकल गया वो दोस्तों का हुजूम जो इन्हें रुखसत करने आया था बस कुछ छूटा तो बस पठान जो आज भी मेरे करीब है ! और इस समय पुणे मै अपने भविष्य को सवारने मै जी जान से लगे हुए है .! तुम्हारे लिए ......पठान इसकी तो बनती है ! ये आप नहीं समझेंगे ये हमारी बात है अश्फाक से संपर्क 09326505492
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