भारतीय परंपरा मे शादी को एक संस्कार के रूप मे माना जाता है और दूसरी तरफ पत्रकारिता को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ मन जाता है ,अब आप सोच रहे होंगे इन दोनों बातो का क्या? ओर, छोर है ! जब दो लोगो को साथ रखने के लिए पूरी नीति बनाई जाती है उसे हम शादी कहते है ओर ठीक दूसरी तरफ किसी अखबार को निकालने से पहले जो नीति बनाई जाती है उसे पत्रकारिता कहते है! मैंने नहीं ,आप ने भी शादी की इस नीति को करीब से देखा होगा की किस तरह लड़के ओर लड़की के परिवार वाले हँस कर नाराज होकर रूठकर ,मानकर शादी संस्कार को पूरा कर ही लेते है ठीक दूसरी तरफ अखबार के ऑफिस मे भी कुछ मुझे ऐसा ही देखने को मिला ! इन दोनों की समानता की शुरुआत होती है दोनों के टाइम से एक अखबार निकालने की नीति सुबह ११ बजे से शुरु हो जाती है ओर दूसरी तरफ बारात के स्वागत की तेयारी भी इसी टाइम के आस पास शुरु हो जाती है ! लड़की के परिवार मे स्वागत के लिए सभी बड़े अपना काम छोटो को थमा कर घर के किसी कोने मे आप को देश दुनिया की बाते करते सिगरेट सुलगाते हुए मिल ही जायेंगे साथ ही अखबार के मीटिंग के बाद भी ऐसा ही देखने मिल जायेगा ! बड़े लोगो की सिगरेट औए बाते खत्म होती है फिर नजर जाती है उन कामो जो उनके थे जिसके लिए उन्हें हर तरह का फेसला लेने की आजादी थी पर उन्होंने अपने बदक्पन मै नही किये सिर्फ रास्ते बताये जिनपर वो चलना सोच सकते थे पर चल नहीं सकते थे ! १ बजे दौर शुरु होता है हड्काने का ओर छोटो को ये कहने का की तुम्हारी उम्र मै हम ये सब पलक झपकते करलेते थे अखबार मै भी यही होता है इस वक़्त तक बस शब्द अलग अलग होते है लंच के वक़्त तक कामो को एक लाइन मै रख लिया जाता है शादी के घर मै जिस तरह एक एक करके रिश्तेदारों का आना शुरु हो जाता है ठीक उसी तरह अखबार के ऑफिस मै खबरों का आना शुरु हो जाता है ओर उन्हें उनकी हेसियत के हिसाब से जगह दे दी जाती है उसी तरह शादी में कानपुर वाली भुआ ओर भोपाल वाली मौसी की जगह भी अलग ही होती है .बरात शाम के ६ बजते ही अखबार का ऑफिस एक जंग का मैदान बन चूका होता है सभी अपने अधिकारों का खुलकर दुरूपयोग करते है सिर्फ वरिष्ठो के कनिस्ठो को छोड़कर! शादी वाले घर मै भी ,माहोल कुछ यही होता है छोटो के द्वारा की गई मेहनत शाम को बड़ो के सर पर चमकती है ओर जब बारात आती है तो सिर्फ मेहनत कश को एक साफ़ सफेद पोशाक मै नुमाईस का मोका मिलता है जो उसको किसी वरदान जेसा ही लगता है अखबार मै भी यही होता है ,अगर हिट है तो हम ही हम थे अगर पिट गई कोई खबर तो तुम ही तुम थे! ओर शादी मै सब कुछ ठीक हुआ तो वरिष्ठो ने किया ओर कुछ गलत हुआ तो ये भोपाल वाली मौसी के लड़के की वजह से हुआ पीकर शादी मै आ गया ! खेर दोनों परिस्थितियों मै नाम उछलता है उसके सूत्रधार का जिसकी गलती सिर्फ इतनी होती है की उसने विशवास किया था !
इन गलियों को लिखने का मकसद कुछ खास है क्योकि ये गलिया ले जाती है आपको उन पक्की सडको पर जहा आप भूल जाते है इन गलियों को और न कहिएगा की यही सब लिखते रहते हो .यही सब तो है वो गलियां............अब उसके शहर में ठहरें के कूच कर जाएँ फ़राज़ आओ सितारे सफ़र के देखते हैं
गुरुवार, 27 मई 2010
शादकारिता
भारतीय परंपरा मे शादी को एक संस्कार के रूप मे माना जाता है और दूसरी तरफ पत्रकारिता को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ मन जाता है ,अब आप सोच रहे होंगे इन दोनों बातो का क्या? ओर, छोर है ! जब दो लोगो को साथ रखने के लिए पूरी नीति बनाई जाती है उसे हम शादी कहते है ओर ठीक दूसरी तरफ किसी अखबार को निकालने से पहले जो नीति बनाई जाती है उसे पत्रकारिता कहते है! मैंने नहीं ,आप ने भी शादी की इस नीति को करीब से देखा होगा की किस तरह लड़के ओर लड़की के परिवार वाले हँस कर नाराज होकर रूठकर ,मानकर शादी संस्कार को पूरा कर ही लेते है ठीक दूसरी तरफ अखबार के ऑफिस मे भी कुछ मुझे ऐसा ही देखने को मिला ! इन दोनों की समानता की शुरुआत होती है दोनों के टाइम से एक अखबार निकालने की नीति सुबह ११ बजे से शुरु हो जाती है ओर दूसरी तरफ बारात के स्वागत की तेयारी भी इसी टाइम के आस पास शुरु हो जाती है ! लड़की के परिवार मे स्वागत के लिए सभी बड़े अपना काम छोटो को थमा कर घर के किसी कोने मे आप को देश दुनिया की बाते करते सिगरेट सुलगाते हुए मिल ही जायेंगे साथ ही अखबार के मीटिंग के बाद भी ऐसा ही देखने मिल जायेगा ! बड़े लोगो की सिगरेट औए बाते खत्म होती है फिर नजर जाती है उन कामो जो उनके थे जिसके लिए उन्हें हर तरह का फेसला लेने की आजादी थी पर उन्होंने अपने बदक्पन मै नही किये सिर्फ रास्ते बताये जिनपर वो चलना सोच सकते थे पर चल नहीं सकते थे ! १ बजे दौर शुरु होता है हड्काने का ओर छोटो को ये कहने का की तुम्हारी उम्र मै हम ये सब पलक झपकते करलेते थे अखबार मै भी यही होता है इस वक़्त तक बस शब्द अलग अलग होते है लंच के वक़्त तक कामो को एक लाइन मै रख लिया जाता है शादी के घर मै जिस तरह एक एक करके रिश्तेदारों का आना शुरु हो जाता है ठीक उसी तरह अखबार के ऑफिस मै खबरों का आना शुरु हो जाता है ओर उन्हें उनकी हेसियत के हिसाब से जगह दे दी जाती है उसी तरह शादी में कानपुर वाली भुआ ओर भोपाल वाली मौसी की जगह भी अलग ही होती है .बरात शाम के ६ बजते ही अखबार का ऑफिस एक जंग का मैदान बन चूका होता है सभी अपने अधिकारों का खुलकर दुरूपयोग करते है सिर्फ वरिष्ठो के कनिस्ठो को छोड़कर! शादी वाले घर मै भी ,माहोल कुछ यही होता है छोटो के द्वारा की गई मेहनत शाम को बड़ो के सर पर चमकती है ओर जब बारात आती है तो सिर्फ मेहनत कश को एक साफ़ सफेद पोशाक मै नुमाईस का मोका मिलता है जो उसको किसी वरदान जेसा ही लगता है अखबार मै भी यही होता है ,अगर हिट है तो हम ही हम थे अगर पिट गई कोई खबर तो तुम ही तुम थे! ओर शादी मै सब कुछ ठीक हुआ तो वरिष्ठो ने किया ओर कुछ गलत हुआ तो ये भोपाल वाली मौसी के लड़के की वजह से हुआ पीकर शादी मै आ गया ! खेर दोनों परिस्थितियों मै नाम उछलता है उसके सूत्रधार का जिसकी गलती सिर्फ इतनी होती है की उसने विशवास किया था !
बुधवार, 12 मई 2010
वक़्त नहीं है ...
हर ख़ुशी है ,लोगों के दामन में पर
एक हसी के लिए वक़्त नहीं है !
दिन रात डूबती हुई दुनिया में
जिंदगी के लिए ही वक़्त नहीं है !
माँ की लोरी का तो एहसास है ,पर
माँ को माँ कहने का वक़्त नहीं है !
सारे रिश्तो को हम मार चुके है
पर उन्हें दफ़नाने का वक़्त नहीं है
सारे नाम दिमाग में है ,पर उन्हें
पुकारने का वक़्त नहीं है !
गेरो की क्या बात करे , जब अपनों
के लिए वक़्त नहीं है ! आँखों मै हे नींद
बड़ी पर जिसकी गोद मै सर रखकर सोये हम
उसके पास वक़्त नहीं है !
मंगलवार, 11 मई 2010
सिर्फ एक कहानी हूँ मैं
अगर रख सको तो एक निशानी हूँ मैं,
खो दो तो सिर्फ एक कहानी हूँ मैं ,
रोक पाए न जिसको ये सारी दुनिया,
वोह एक बूँद आँख का पानी हूँ मैं.....
सबको प्यार देने की आदत है हमें,
उतना ही ज्यादा मुस्कराने की आदत है हमें...
खो दो तो सिर्फ एक कहानी हूँ मैं ,
रोक पाए न जिसको ये सारी दुनिया,
वोह एक बूँद आँख का पानी हूँ मैं.....
सबको प्यार देने की आदत है हमें,
अपनी अलग पहचान बनाने की आदत है हमे,
कितना भी गहरा जख्म दे कोई,
इस अजनबी दुनिया में अकेला ख्वाब हूँ मैं,
सवालो से खफा छोटा सा जवाब हूँ मैं,
जो समझ न सके मुझे, उनके लिए "कौन"
जो समझ गए उनके लिए खुली किताब हूँ मैं,
आँख से देखोगे तो खुश पाओगे,
दिल से पूछोगे तो दर्द का सैलाब हूँ मैं,,,,,
"अगर रख सको तो निशानी, खो दो तो सिर्फ एक कहानी हूँ मैं
नोट- यह पंफ्तिया विपिन यादव ने मध्य प्रदेश के ,सतना से भेजी है ,और यह उनके सफल प्रेम को और उनके प्रेमी के असफल प्रेम को दर्शाती है
शुक्रवार, 7 मई 2010
चंद लम्हे
एक दिन था .एक रात दोनों एक दुसरे से बहुत प्यार करते थे ,अक्सर दोनों अपनी भाग दोड़ भरी जिंदगी से बहार निकल कर शाम को मिल पाते थे .क्योकि दिन भाग दोड़ करता था और रात सभी को आराम देती दोनों के पास बस शाम का वक़्त निकलता था जिसमे वो अपनी कुछ लम्हों की जिंदगी को जी लेना चाहते थे क्योकि रात के ऑफिस का बोस चाँद रात को छुट्टी नहीं देता था और दिन का बोस सूरज दिन को दिन भर जलने के लिए अपने पास ही रखता था ! एक दिन दोनों ने अपनी नोकरी छोड़ने का फेसला किया लेकिन तभी दोनों को उन लोगो का ख्याल आया जो लोग इनकी वजह से दिन और रात मै अपने अपने काम बाट चुके थे ,फिर दोनों ने फेसला किया की इस दुनिया की इस भाग दोड़ भरी जिंदगी को चलाने के लिए कुछ लम्हे ही ठीक है अपनी जिंदगी को जीने के लिए !और फिर एक दिन रात ने चाँद से शादी कर ली और दिन आज भी ज़ल रहा है ,भीग रहा है काँप रहा है ,
शनिवार, 1 मई 2010
साथ क्या ले जाऊँगा
मैं तो झोंका हूँ हवा का उड़ा ले जाऊँगा
जागती रहना तुझे तुझसे चुरा ले जाऊँगा
हो के कदमों पे निछावर फूल ने बुत से कहा
ख़ाक में मिल के भी मैं खुश्बू बचा ले जाऊँगा
कौन सी शै मुझको पहुँचाएगी तेरे शहर तक
ये पता तो तब चलेगा जब पता ले जाऊँगा
कोशिशें मुझको मिटाने की भले हों कामयाब
मिटते-मिटते भी मैं मिटने का मजा ले जाऊँगा
शोहरतें जिनकी वजह से दोस्त दुश्मन हो गये
सब यह रह जायेंगी मैं साथ क्या ले जाऊँगा
जागती रहना तुझे तुझसे चुरा ले जाऊँगा
हो के कदमों पे निछावर फूल ने बुत से कहा
ख़ाक में मिल के भी मैं खुश्बू बचा ले जाऊँगा
कौन सी शै मुझको पहुँचाएगी तेरे शहर तक
ये पता तो तब चलेगा जब पता ले जाऊँगा
कोशिशें मुझको मिटाने की भले हों कामयाब
मिटते-मिटते भी मैं मिटने का मजा ले जाऊँगा
शोहरतें जिनकी वजह से दोस्त दुश्मन हो गये
सब यह रह जायेंगी मैं साथ क्या ले जाऊँगा
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