Text selection Lock by Hindi Blog Tips

गुरुवार, 27 मई 2010

शादकारिता



भारतीय परंपरा मे शादी को एक संस्कार के रूप मे माना जाता है और दूसरी तरफ पत्रकारिता को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ मन जाता है ,अब आप सोच रहे होंगे इन दोनों बातो का क्या? ओर, छोर है ! जब दो लोगो को साथ रखने  के लिए  पूरी नीति बनाई जाती है उसे हम शादी कहते है ओर ठीक दूसरी तरफ किसी अखबार को निकालने से पहले जो नीति बनाई जाती है उसे पत्रकारिता कहते है! मैंने नहीं ,आप ने भी शादी की इस नीति को करीब से देखा होगा की किस तरह लड़के ओर लड़की के परिवार वाले हँस कर नाराज होकर रूठकर ,मानकर शादी संस्कार को पूरा कर ही लेते है ठीक दूसरी तरफ अखबार के ऑफिस मे भी कुछ मुझे ऐसा ही देखने को मिला ! इन दोनों की समानता की शुरुआत होती है दोनों के टाइम से एक अखबार निकालने की नीति सुबह ११ बजे से शुरु हो जाती है ओर दूसरी तरफ बारात के स्वागत की तेयारी भी इसी टाइम के आस पास शुरु हो जाती है !  लड़की के परिवार मे स्वागत के लिए सभी बड़े अपना काम छोटो को थमा कर घर के किसी कोने मे आप को देश दुनिया की बाते करते सिगरेट सुलगाते हुए मिल ही जायेंगे साथ ही अखबार के मीटिंग के बाद भी ऐसा ही देखने मिल जायेगा ! बड़े लोगो की सिगरेट औए बाते खत्म होती है फिर नजर जाती है उन कामो जो उनके थे जिसके लिए उन्हें हर  तरह का फेसला लेने की आजादी थी  पर उन्होंने अपने बदक्पन मै नही किये सिर्फ रास्ते बताये जिनपर वो चलना सोच सकते थे पर चल नहीं सकते थे ! १ बजे दौर शुरु होता है हड्काने का ओर छोटो को ये कहने का की तुम्हारी उम्र मै हम ये सब पलक झपकते करलेते थे अखबार मै भी यही होता है इस वक़्त तक बस शब्द अलग अलग होते है लंच के वक़्त तक कामो को एक लाइन मै रख लिया जाता है शादी के घर मै जिस तरह एक एक करके रिश्तेदारों का आना शुरु हो जाता है ठीक उसी तरह अखबार के ऑफिस मै खबरों का आना शुरु हो जाता है ओर उन्हें उनकी हेसियत के हिसाब से जगह दे दी जाती है उसी तरह शादी में कानपुर वाली भुआ ओर भोपाल वाली मौसी की जगह भी अलग ही होती है .बरात शाम के ६ बजते ही अखबार का ऑफिस एक जंग का मैदान बन चूका होता है सभी अपने अधिकारों का खुलकर दुरूपयोग करते है सिर्फ वरिष्ठो के कनिस्ठो को छोड़कर! शादी वाले घर मै भी ,माहोल कुछ यही होता है छोटो के द्वारा की गई मेहनत शाम को बड़ो के सर पर चमकती है ओर जब बारात आती है तो सिर्फ मेहनत कश को एक साफ़ सफेद पोशाक मै नुमाईस का मोका मिलता है जो उसको किसी वरदान जेसा ही लगता है अखबार मै भी यही होता है ,अगर हिट है तो हम ही हम थे अगर पिट गई कोई खबर तो तुम ही तुम थे! ओर शादी मै सब कुछ ठीक हुआ तो वरिष्ठो ने किया ओर कुछ गलत हुआ तो ये भोपाल वाली मौसी के लड़के की वजह से हुआ पीकर शादी मै आ गया ! खेर दोनों परिस्थितियों मै नाम उछलता है उसके सूत्रधार का जिसकी गलती सिर्फ इतनी होती है की उसने विशवास किया था !  

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें