इन गलियों को लिखने का मकसद कुछ खास है क्योकि ये गलिया ले जाती है आपको उन पक्की सडको पर जहा आप भूल जाते है इन गलियों को और न कहिएगा की यही सब लिखते रहते हो .यही सब तो है वो गलियां............अब उसके शहर में ठहरें के कूच कर जाएँ फ़राज़ आओ सितारे सफ़र के देखते हैं
मंगलवार, 29 जून 2010
तुम से कुछ छिपा नहीं ..
अच्छा बनने का कोई इरादा नही
गर लिखा है तो फिर साथ निभ जाएगा
वरना इसको निभाने का वादा नही......
क्या सही क्या ग़लत सोच का फेर है
एक नज़रिया है ये जो बदलता भी है
एक सिक्के के दो पहलुओं की तरह
फ़र्क इनमें भी कुछ जियादा नहीं....
कुछ भी समझे समझता रहे ये जहाँ
हम भी खुद को बदलने नही जा रहे
हम बुरे हैं भले हैं जैसे भी हैं
हमने ओढ़ा है कोई लबादा नहीं.....
गुरुवार, 24 जून 2010
शरारत या समझदारी
बात उस घर की है जिसमे सात बच्चे रहा करते थे जिसमे से एक लड़की और ६ लड़के थे सभी मै बड़ी दोस्ती भी थी और झगड़े भी थे पर इन सब के बाबजूद एक बात समान थी की सभी अपने ,अपने काम को समय पर पूरा कर लेते थे इनमे से एक बच्चा इतना शरारती था की जब भी घर के बड़े कही बहार जाते तो उस शरारती की जिम्मेदारी बाकी बच्चो को सोप देते बच्चा शरारती था पर काम का था या नहीं ये तो घर के बड़े ही जानते थे एक दिन की बात है ,कुछ दिनों के लिए घर के बड़े लोग शहर से बहार गए और जाते वक़्त सभी बच्चो को बुलाया और कहा हम लोग कुछ दिन के लिए बहार जा रहे है पीछे से घर का ध्यान रखना और उस शरारती का भी जो इस वक़्त तुम लोगो के बीच नहीं है ,जब वो आये तो उसे यह बता देना की उसे घर से बहार तब तक नहीं जाना है जब हम आ नहीं जाते और इतना कहकर वो चलते बने उनके जाने के बाद बाकी बच्चे आपस मै बात कर ने लगे की अगर उसे सारा दिन घर मै बिठा रखेंगे तो जो घर के बहार के काम कौन करेगा जैसे सब्जी लाना बिल जमा करना और भी कई सारे काम थे जो इस शरारती की जिम्मेदारी मै शामिल थे अब सभी उस शरारती के आने की राह तक ने लगे जैसे ही वो आया बाकी बच्चो मै से एक बच्चा बदक्पन वाले अंदाज़ मै बोला तुम्हे कही नहीं जाना है सिर्फ घर पर ही रहना है ठीक है बच्चे ने मुस्कुराकर कहा की इसका मतलब मै सिर्फ आराम करूँगा बाकियों ने एक स्वर मै कहा हां सिर्फ एक को छोड़कर और वो थी उस घर की बेटी जो जानती थी की घर कैसे चलाया जाता है और अगर वो ये सब बाकियों को समझाएगी तो उसका इसका उत्तर क्या मिलेगा इसी लिए शांत ही रहा करती थी !दिन शुरु हुआ शरारती जैसे ही नींद से जगा सभी आपस मै लड़ रहे थे उसने पूछा लड़ क्यों रहे हो तो उत्तर मिला मै इस से कब से कह रहा हु घर मै दूध नहीं है ले आओ तो जा ही नहीं रहा कहता है ये मेरा काम नहीं है मेरा काम चाय बनाना है मै सिर्फ चाय बनाऊंगा ,फिर दुसरे से पूछा तुम क्यों लड़ रहे हो , तो उसने कहा की मै कब से इससे कह रहा हु बिल जमा करवा दे बिजली नहीं है ये जा ही नहीं रहा ,शरारती ने कहा मै तुम लोगो के झगड़े को पलक झपकते खत्म कर सकता हु सब ने कहा कैसे उसने कहा मै ये सारे काम कर दूंगा बस तुम ये सब किसी से कहना मत सभी ने सोचा और तुरंत हा कर दी और उन कामो मै लग गए जो घर के बड़ो की मोजूदगी मै कर नहीं पाते थे और शरारती को उस दिन इस बात का एहसास हो गया की हम आजादी मिलने के बाद दरअसल गुलाम हो और साथ मै जिम्मेदारिया भी बड़ जाती है और शायद घर के बड़े भी ये बात कही ना कही जानते थे !
मंगलवार, 22 जून 2010
किसी की वेबसी पर भी होता है फायदा
मै बात नहीं करना चाहता किसी मजदूर की बेबसी की वो सड़क पर सो रहा है ,जबकि उसके पुरखो ने ताजमहल बनाया था !नहीं कहना चाहता की वो रोज अपने खाने के लिए नया चूल्हा बनाता है क्योकि वो जो कर रहा है इसके पीछे उसका कर्म है जो उसे ऐसा करने के लिए शक्ति दे रहा है ,और कुछ लोग इस कर्म को अपने शब्दों मै बांधकर बेबसी .लाचारी का रूप देते तो वो लोग उस बेबस के लिए तो कुछ नहीं कर पाते पर अपने लिए कई ऐसी टिप्पड़िया बटोर लेते है जो उनके इन शब्दों को आगे बढाने मै एसे काम करती है जैसे आग मै घी और फिर चल पढ़ते है ऐसी दुनिया मै जहा इंसान को इंसान नहीं एक थ्योरी मै बांधकर देखा जाता है ,गर उसे पैसो की जरुरत है तो पूंजीवादी सोच ,सभी के लिए समान तो कम्युनिस्ट ऐसे नामो से उसे नवाज दिया जाता है और अपना उल्लू सीधा कर लिया जाता है और कुछ ऐसे लोगो मै बैठा जाता है जो इन्ही के बिरादरी के होते है और जो इनकी हा में हा मिलाकर इन्हें कुछ और थ्योरिया पकड़ा देते है और सफ़र शुरु हो जाता है ऐसी यात्रा का जिसकी मंजिल का तो पता नहीं बस चले जा रहे है कुछ ऐसे नामो के साथ जो एक ऐसे इंसान की समझ के बहार है जिनका ये भला करने निकले है पर अपना भला हो तो बुरा क्या है ?
शनिवार, 19 जून 2010
समझ से परे ?
ने जिनके पास उनके मतलब दूर ,दूर तक नहीं थे !
फिर राग अलाप लिया दोस्ती का जो कभी शब्दों के
ऊपर समझी ही नही थी फिर वास्ता दिया वफ़ा का
जिससे वास्ता कोसो दूर तक ना था थक हार कर खीच
दी चंद लाइने कागज पर और खुसफेमियो मै होकर रात गुजार दी
की अब सब ठीक हो गया है !जैसे किसी सरकारी डाक्टर ने किसी गरीब को
ढाढस बंधा दी हो की अब तुम कुछ दिन और जी लोगे !
शुक्रवार, 18 जून 2010
बुधवार, 16 जून 2010
शनिवार, 5 जून 2010
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