मै बात नहीं करना चाहता किसी मजदूर की बेबसी की वो सड़क पर सो रहा है ,जबकि उसके पुरखो ने ताजमहल बनाया था !नहीं कहना चाहता की वो रोज अपने खाने के लिए नया चूल्हा बनाता है क्योकि वो जो कर रहा है इसके पीछे उसका कर्म है जो उसे ऐसा करने के लिए शक्ति दे रहा है ,और कुछ लोग इस कर्म को अपने शब्दों मै बांधकर बेबसी .लाचारी का रूप देते तो वो लोग उस बेबस के लिए तो कुछ नहीं कर पाते पर अपने लिए कई ऐसी टिप्पड़िया बटोर लेते है जो उनके इन शब्दों को आगे बढाने मै एसे काम करती है जैसे आग मै घी और फिर चल पढ़ते है ऐसी दुनिया मै जहा इंसान को इंसान नहीं एक थ्योरी मै बांधकर देखा जाता है ,गर उसे पैसो की जरुरत है तो पूंजीवादी सोच ,सभी के लिए समान तो कम्युनिस्ट ऐसे नामो से उसे नवाज दिया जाता है और अपना उल्लू सीधा कर लिया जाता है और कुछ ऐसे लोगो मै बैठा जाता है जो इन्ही के बिरादरी के होते है और जो इनकी हा में हा मिलाकर इन्हें कुछ और थ्योरिया पकड़ा देते है और सफ़र शुरु हो जाता है ऐसी यात्रा का जिसकी मंजिल का तो पता नहीं बस चले जा रहे है कुछ ऐसे नामो के साथ जो एक ऐसे इंसान की समझ के बहार है जिनका ये भला करने निकले है पर अपना भला हो तो बुरा क्या है ?

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