इन गलियों को लिखने का मकसद कुछ खास है क्योकि ये गलिया ले जाती है आपको उन पक्की सडको पर जहा आप भूल जाते है इन गलियों को और न कहिएगा की यही सब लिखते रहते हो .यही सब तो है वो गलियां............अब उसके शहर में ठहरें के कूच कर जाएँ फ़राज़ आओ सितारे सफ़र के देखते हैं
मंगलवार, 29 जून 2010
तुम से कुछ छिपा नहीं ..
अच्छा बनने का कोई इरादा नही
गर लिखा है तो फिर साथ निभ जाएगा
वरना इसको निभाने का वादा नही......
क्या सही क्या ग़लत सोच का फेर है
एक नज़रिया है ये जो बदलता भी है
एक सिक्के के दो पहलुओं की तरह
फ़र्क इनमें भी कुछ जियादा नहीं....
कुछ भी समझे समझता रहे ये जहाँ
हम भी खुद को बदलने नही जा रहे
हम बुरे हैं भले हैं जैसे भी हैं
हमने ओढ़ा है कोई लबादा नहीं.....
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