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बुधवार, 28 अप्रैल 2010

पहल

धुंद मै अन्धकार मै पर्दों में दिवार मै
कही छिपता है , सच  कभी
  झूट के अम्बार मै ! 
सच को सच से मिलाते  है
 कुछ  य़ू झूट से  निगाह मिलाते है
हम ,की डरते नहीं कुछ भी अंजाम हो
अब फरेब से परदे उठाते है हम !
किसी को तो करना ही होगा कुछ
  ये सोच के एक कदम अब उठाते है हम ,

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