उम्र ठीक ठाक ही है
28 के करीब पर फोन में एक नंबर ही मिला
जिसे दिल ने कहां हां ये अपना है हां बस यही है ... क्या दूर रहकर करीब हुआ जा सकता है। क्या दूरी एक नई नजदीकी है जहां दूर जाने पर सारे खतरे हैं...
बुरे ख्यालों के सच होने के, वहीं ये संभावना भी है कि आप अपने फोकस को फिर से एडजस्ट कर कई
नये सत्यों को ठीक से देख सकते हैं। साथ होने से पहले तक हजारों ख्वाहिशों की
कितनी लम्बी फेहरिस्त है। उसके साथ हर वह चीज़ करनी है, जिसका वास्ता खुशी से है। खुशी का बांटा ही स्वर्ग है, न बांटा ही नरक। साथ की खुशी उस खुशी से अलग है, जिसका वायदा हजारों ख्वाहिशों में है। 'साथ छूटने पर ऐसा क्यों होता है कि साथ छोटा हो जाता है और
छूटना बड़ा। कोई बात नहीं है अगर कुछ दिन बिल्कुल
सामान्य हों। पर उनका महान न होना और सामान्य होना तुम्हें जीने से नहीं रोक
सकता। अक्सर वही दिन होते हैं, जब हमें सिर झुकाए सूरजमुखी और टूटे पर
वाले परिंदे दिखलाई पड़ते हैं। वे हमारे भीतर के नये मायनों को खोलते
हैं। एक ऐसे ही दिन तुम मुझे मिले। मुझे वह तारीख याद नहीं। पर देखो तुमने मेरा क्या हाल कर दिया।
अब वो आवाज़ उसे जगाती, छेड़ती.
आवाज़ उसके साथ प्यार करती। आवाज़ उसके बिस्तर की सलवटों को पढ़ती। आवाज़ उसे सुला देती। आवाज़ उसके सपनों और स्मृतियों को गड्ड
मड्ड कर देती। कभी यहाँ से बुलाती। कभी वहां से। आवाज़ कवितायेँ पढ़ती। आवाज़ एक लम्बा वाक्य कहती. आवाज़ एक लम्बे
वाक्य को दुबारा कहती। आवाज़ कई बार एक दूसरे वाक्य को अधूरा छोड़ देती। आवाज़ चुप्पी को ताड़ जाती, उसे समझा लेती, बुझा लेती। आवाज़ उस वाक्य को पूरा करती। आवाज़ उसे पेट से हंसा देती। और कई बार इतनी खामोशी से भर देती की वक़्त रेगिस्तान से गुज़र रहा है। तारे रास्ते दिखलाते हैं। जासूस बीच बीच में अपने निशान मिटाता चलता है। क्या उसके पीछे भी कुछ लगा हुआ है शक और वहम की तरह आदिम, जो अकेले
अंधेरे में मूतते वक़्त कंपकंपी की तरह छूटता है। हर दिन मुझे खुद को तुम्हें फोन करने से रोकना पड़ता है। वे दूर है, पर जुदा नहीं । जब भी अकेले होते साथ होते । बहुत दिनों तक जब
वे करीब न हो पाते तो शब्दों से एक दूसरे को छूते शब्द शरीर बन जाते । कई
बार शब्द चुक जाते । पर साथ होने के लिए ज़रूरी था कुछ तो कहना ।....
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