इन गलियों को लिखने का मकसद कुछ खास है क्योकि ये गलिया ले जाती है आपको उन पक्की सडको पर जहा आप भूल जाते है इन गलियों को और न कहिएगा की यही सब लिखते रहते हो .यही सब तो है वो गलियां............अब उसके शहर में ठहरें के कूच कर जाएँ फ़राज़ आओ सितारे सफ़र के देखते हैं
रविवार, 12 दिसंबर 2010
शादी का सफ़र
आज पुरे ९ दिनों बाद शहर में वापस आ गया हु इस्टेसन के उतरने के साथ ही दिल्ली की सर्दी ने काँप ने पर मजबूर कर दिया इससे पहले मोबाइल निकालू और वही नंबर घुमाऊ इससे अच्छा होगा ९ दिन पहले चलते है ! इस बार अपने जन्म स्थान जाने का मकसद बहुत खास था कहा जाये तो दो मकसद थे पहला अपने बहुत खास मित्र की शादी और दूसरा अपने खास मित्र से मिलने का जूनून जो पिछले डेढ़ साल से दिल में कही छुप कर बैठा था ! आज पूरे तीन साल बाद भी कल ही की बात लगती है ,लगता कल ही हमने पुष्पेन्द्र की फोटो पर हार माला डाल कर होस्टल के सभी लडको को इकठा कर के उसकी शोक सभा लगा दी थी ये पुष्पेन्द्र वही है जिनकी शादी २ दिसम्बर २०१० को थी और लगता है कल रात की बात तो है जब मैंने और नितेश ने टल्ली होकर पूरे होस्टल को सर पर उठा लिया था उस रात मेरे दोस्त मै तुझे छोड़ कर नहीं जाता पर क्या करू मै खुद उस हालत मै था की संभल नहीं प् रहा था लेकिन जब हम मिले तो ऐसा नहीं लगा की तू या में किसी बात से नाराज होंगे इसके लिए शुक्रिया ! इन दो दिनों को कभी नहीं भूलूंगा जो तुम तीनो ने मुझे दिये अमित ,रंधीर ,नितेश ये मेरे कालेज के दिनों के साथी है जो आज भी वैसे है जेसे पहले थे सफ़र के दोरान इंतनी मस्ती हुई के आप सोच भी नहीं सकते हम चारो को देख कर सभी यही सोच रहे थे की कालेज के लफंगे परिंदे है जबकि सभी चोथे स्तंभ को पकडे हुए है नितेश और रंधीर भोपाल राज एक्सप्रेस मै रिपोर्टर है तो अमित पत्रिका से जुड़े हुए है और रही बात मेरी तो हम तो आशिक मिजाज़ है आशिकी से काम कर रहे है सच मै एक यादगार सफ़र और शब्दों को समेट ने से पहले पुष्पेन्द्र उर्फ़ कुअर साहब को ढेर सारी शादी की शुभकामना !और कमरे पर आ चुका हु अब उससे ढेर सारी बाते करूँगा पर क्या करे तन्हाई है जो ऐसा नहीं करने देगी !
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