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गुरुवार, 28 अप्रैल 2011

पतझड़ भी बसंत दीखता है

शाम उदास ही क्यों रहती है ?  रात जगती  क्यों रहती है ?  दिन थकासा क्यों दीखता है ?  तुम नहीं समझ पाओगी
क्योकि तुमने ये रात ,दिन ,और शाम मेरे साथ नहीं  गुजारे अब तुम कहोगी में झूट बोल रहा हु पर सच तो यह है की में आज की बात कर रहा हु क्योकि अब पतझड़  आचुका है और तुम बसंत को पकड़ कर बेठी हो ,और मुझ पर बार बार अपना बसंत थोप कर कहती हो की तुम बदल गए अरे में नहीं बदला मौसम बदल चुका है काश तुम इस सच के साथ मुझे आज भी अपना पाती  तो ,थोडा सुकून मिलता इन पतझड़  के दिनों में लेकिन तुम तो भाग रही हो उन मौसमो की तरफ जो पतझड़ है पर तुम्हे बसंत दीखते है




 

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