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शनिवार, 30 अप्रैल 2011

एक-मई अंतरराष्ट्रीय मज़दूर दिवस अमर रहे...दुनिया के मेहनतकशो-एक हो!एक-हो!!..


    सभ्य समाज में अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर  दो ही  प्रकार के दिवस मनाये या याद किये जाते हैं.एक-वे जिनमें किसी खास मजहब - धर्म का महापुरुष अवतरित हुआ हो या उसकी नीव रखी हो! दूसरे-वे जिनमें उन तथाकथित अवतारी महापुरषों ने या तो आत्म बलिदान किया हो या अपनी बारी आने पर लोकिक शरीर त्याग किया हो! इन दोनों ही सूरतों में सम्पूर्ण मानवता का  हित संवर्धन और विश्व कल्याण की कामना के हेतु एक अलोकिक दिव्य शक्ति -इश्वर ,अल्लाह  या गोंड की परिकल्पना और उसमें मानवेतर मूल्यों की स्थापना में आश्था-विश्वाश -श्रद्धा का होना नितांत जरुरी है.मानव ने जब वैज्ञानिक द्वंदात्मक दर्शन के आधिभौतिक रूप में इस पृथ्वी और सम्पूर्ण ज्ञात ब्रह्माण्ड को परिभाषित करने की योग्यता हासिल की तब उसे यह स्वीकारने में कतई हिचक नहीं हुई कि चेतना के स्तर पर मानव के सांसारिक  सुख -दुःख में किसी अलौकिक  ईश्वरीय शक्ति का कोई हाथ नहीं है.इस पृथ्वी पर उपलब्ध तमाम संसाधन -जीवन के उपादान-प्राकृतिक नेमतें -पानी -हवा -धरती और प्राकृतिक समस्त नैसर्गिक संसाधनों पर न केवल बुद्धिबल सज्जित मानव का -अपितु चर -अचर समस्त जीवधारियों का 'सबका सब पर सामूहिक स्वामित्व है' इस दर्शन ने ही सबसे पहले दुनिया के तमाम मानवता वादियों को ये य्ह्साश कराया था की दुनिया में दो वर्ग हैं.एक वर्ग वह जो अपने श्रम श्वेद से इस धरती को सुन्दर और रहने योग्य बनाता है ,दूसरा वर्ग वह है जो अपनी बौद्धिक चालाकी से इस वसुंधरा का भोग करता है.सामंतवाद के पराभव और पूंजीवाद के उद्भव ने यह फर्क और स्पष्ट कर दिया तथा परिणाम स्वरूप द्वंदात्मक संघर्ष ने सारे विश्व सर्वहारा के बंधन मुक्त होने का -एक मई १८८६ को सूत्रपात कर 'क्रांति'शब्द को ईजाद किया.
           दरसल मई दिवस वह दिन है ,जिस दिन दुनिया  का सचेतन मजदूर एक वर्ग के रूप में ,एक विश्वव्यापी अजेय शक्ति के रूप में अपने समकालिक संघर्षों और उपलब्धियों का वार्षिक प्रतिवेदन प्रस्तुत करते हुए,अतीत के अपने शानदार संघर्षों और उलब्धियों की विरासत को न केवल अक्षुण रखने बल्कि उसे अपनी मंजिल तक ले जाने का संकल्प दुहराता है.मई दिवस वह दिन है जिस दिन सम्पूर्ण  भू मंडल का श्रमशील मानव अपने हालत का विहंगावलोकन और शोषक वर्ग का सिंहावलोकन करता है.
                         आम तौर पर हर-रोज और खास तौर से एक-मई को विश्व का जागृत मजदूर-किसान-कर्मचारी-कारीगर और विवेकशील चेतन्य मानव अपने संघर्षों की धार पैनी करता है.शोषक वर्ग के साथ आये दिन की झडपों और अपने जख्मों का जायजा लेना,आगामी सत्र में किये जाने वाली जद्दोज़हद का शंखनाद करना तथा तमाम जनता को अपने साथ जोड़कर शाशक वर्ग की  प्रतिगामी -जनविरोधी नीतियों -राष्ट्रघाती ,मानव हन्ता कार्यक्रमों को बलात रोकने की   कोशिश करना
 भी मजदूर वर्ग अपना कर्तव्य घोषित करता है
       बर्बाद अतीत की भजन मंडलियों के खिलाफ बेहतर भविष्य की  उत्क्रष्ट अभिलाषा में अंतर-राष्ट्रीय मजदूर विरादरी -सर्वहारा की विराट जन-मेदिनी रण-हुंकार करती हुई नारा लगाती है-
       दुनिया के मेहनतकशों --एक हो-एक हो...!!.
     
       हर उद्द्योग-धंधे के मजूरो -एक हो ...एक हो ...!!

        आएगा भई -आएगा..नया जमाना -आएगा...!
     
         कमानेवाला खायेगा..लूटने वाला जायेगा...!
   
        क्या मांगे मजदूर किसान? रोटी -कपडा-!और मकान....!

       लाल -लाल लहराएगा...नया ज़माना  आएगा...1

जब तक  नंगा -भूंखा इंसान रहेगा...धरती पर तूफ़ान रहेगा....!

     मुनाफाखोरों  को फाँसी दो ....फाँसी दो....!

      वेरोजगारों  को काम दो.काम के पूरे दाम दो...!

      गोदामों में भरा अनाज... जनता क्यों भून्खों मरती आज....!

       बंद कारखाने चालू करो....देश को बेचना बंद करो...!

      श्रम की लूट बंद करो...काम के घंटे कम करो....!

       अमेरिका के आगे घुटने टेकना बंद करो!

     देश की रक्षा कौन करेगा? हम करेंगे!हम करेंगे!!

     शोषण-उत्पीडन से कौन लडेगा?हम लड़ेंगे!हम लड़ेंगे!!

     एक-मई  anarrashtreey  majdur दिवस -jindawad!

  सिकागो के अमर शहीदों को लाल सलाम!

         वास्तव में ये नारे आज भी उतने ही मौजु हैं जितने कि एक-मई १८८६ के दिन  थे.शिकागो के हे ! मार्केट स्कोयर पर १-मई से ४ मई -१८८६ के चार दिनों में घटे घटनाक्रम में इन नारों कि उत्पत्ति हुई थी.फर्क इतना भर है कि तब ये नारे सिर्फ शिकागो के हे१ मार्केट चौराहे तक सीमित थे ,आज सारे संसार के मजदूर अपनी-अपनी भाषा में उन्ही नारों को केन्द्रित करते हुए अपने हकों कि हिफाजत और बेहतर इंसानी जिन्दगी का आह्वान कर रहे हैं.
       यह संसार प्रसिद्द है कि एक -मई १८८६ को अमेरिका  के शिकागो शहर के मजदूर -आठ घंटे काम-आठ घंटे आराम और आठ घंटे पारिवारिक जिमेदारियों या मनोरंजन के लिए  मांग रहे थे,मजदूरों की शांतिपूर्ण सभाएं रोज-रोज लगातार जारी थीं,ऐंसी ही  एक सभा हे!मार्केट स्क्वायर पर चल रही थी,३ मई को मालिकों और शाशकों की शह पर पुलिस ने निहत्थे -अहिंसक मजदूरों पर अंधाधुन्द गोलियां चला दीं.६ मजदूरों ने वहीं सभा स्थल पर दम  तोड़ दी,इस जघन्य हिसा के विरोध में शहर के हजारों मजदूर दूसरे दिन-४,मई को फिर उसी जगह एकजुट होकर नारे लगा रहे थे कि पूंजीपतियों ने अपने एजेंटों कि मार्फ़त उस शांतिपूर्ण-अहिंसक जन समूह पर बम फिकवा दिए.जिसमें सेकड़ों घायल हुए अनेक अपंगता को प्राप्त हुए .चार ने मौके पर ही दम तोड़ दिया. एक सार्जेंट  भी मारा गया.
         उक्त घटना में मारे गए मजदूरों के  हमदर्द सहयोगियों पर झूंठे मुकद्दमें लाद दिये गए.हालाँकि इन मजदूरों पर कोई जुर्म सावित नहीं हुआ किन्तु मालिकों के दवाव और लोभ -लालच में जजों ने ४  जुझारू  मजदूर नेताओं -अल्वर्ट पार्संस , आगस्त स्पाईस ,एडोल्फ फिशर और जार्ज एंगेल को  ११ नवम्बर-१८८७ को फांसी कि सजा सुनाई थी.इसके आलावा अनेकों को कारागार में ठूंस दिया था.
           हालाँकि मई दिवस एक ऐंसा दिन है जो पूंजीवादी शाशक वर्गों  द्वारा मेहनतकश वर्ग कि नृशंस हत्याओं का गवाह है किन्तु यह पहला और अंतिम दिवस नहीं है.आज देश और दुनिया में सर्वत्र कोहराम मचा हुआ है ये जन-आकांक्षाओं बनाम सरमायेदारी के द्वन्द का अविराम सिलसिला है.भारत में भी वर्तमान निष्ठुर पूंजीवादी प्रभुत्व संपन्न वर्ग ने राज्य-व्यवस्था और राष्ट्र सम्पदा दोनों पर ही कब्ज़ा कर रखा है.आम-जनता,और मेह्नात्कश्वर्ग को उसके अंतहीन कष्टों -अभावों के लिए पूर्व-जन्म के कर्मों का फल बताकर पाखंडी बाबाओं कि भभूत से संतुष्ट होने का सरंजाम किया जा रहा है.भृष्टाचार से जनता का ध्यान बटाने के लिए चोरों के बगलगीर 'चोर-चोर चिल्ला रहे हैं'
     aaj देश में hajaron -लाखों कल-कारखाने बंद पड़े हैं..jo aadhe adhure uddyog chal रहे हैं उनमें भयावह शोषण जारी है.अधिकांश गैर-सरकारी या निजी क्षेत्र में उच्च शिक्षित युवाओं को विना किसी भविष्यगत गारंटी -पेंशन,ग्रेचुटीअर्जित- अवकाश,मात्रत्व अवकाश,के १२ से १४ घंटे कोल्हू के बैल की भांति जोता जा रहा है.असंगठित क्षेत्र में जब अच्छे -खासे शिक्षित युवाओं की ये हालत है तो अर्ध शिक्षित और सम्पूर्ण निरक्षर करोड़ों वेरोजगार युवाओं की उस मजबूरी को सहज ही समझा जा सकता है;जिसके तहत ये "मुल्क के असली मालिक" बंधुआ mazdur की तरह आर्थिक-मानसिक-सामाजिक -गुलामी में छटपटा रहे हैं.वर्तमान दौर के आर्थिक उदारीकरण  ka प्रशश्ति गान करने वाले मीडिया को, कलयुगी भगवानो के विराट आर्थिक साम्राज्य के बरक्स देखना -दिखाना चाहिए,mukhy dhara के मीडिया से तो ummeed की ही जा saktee है कि देश कि yuva peedhi के सरोकारों को भी thodee see jagah de.
      आर्थिक udareekaran,pragat ouddyogiki tatha shrmik वर्ग  को km mazuree dene के parinaam swroop poonjipation ka munafa gagan chumbi hota जा रहा है,और anajon ka,khaddyaany ka utpaadan behtar hone के vavvjood  kisaan aatm hatya करने को majbur क्यों है?dharmik updesh karm kaand,aam aadmee कि shraddha और babaon के shree charno में chadhava  badhta जा रहा है fir भी samaaj में apraadh,bhrushtachar ,loot,daketee,rishvarkhoree और beimano ka bolbala क्यों है?
      एक-मई anatrrashtreey मजदूर दिवस पर देश और दुनिया ka shoshit ,सर्वहारा,sankalp lekar sanghrsh के path पर ekjutta के sath is nainsafee,gairbarabree की vyvstha को samaapt kar एक ainse samaaj banane ka udghosh karta है -jismen koi bhunkha न रहे ,koi apradhi न bane,koi किसी ka शोषण न kare,koi किसी ka उत्पीडन न kare...
      दुनिया  भर     के किसान-मजदूर और विश्व सर्वहारा एक-मई अंतर-रास्ट्रीय मजदूर दिवस को सवा सौ साल से  मनाते चले आ रहे hain इतनेबरसों बाद भी उसका सर्वजनहिताय-सर्वजनासुखाया सन्देश व्यपक स्तर  तक नहीं पहुँच पाया है.aaj के पढ़े लिखे नौ-जवानो मेंसे अधिकांस को नहीं मालूम की काम के घंटों को सीमिति करने -आठ घंटे श्रम करने,आठ घंटे पारिवारिक और सामाजिक सरोकार के लिए और आठ घंटे स्वयम के आराम क्र लिए क्यों मिलना चाहिए? यही वजह है की वे अनावश्यक अनुत्पादक बैटन में उलझकर अपने सामाजिक सरोकारों से दूर होकर अपने हिस्से ka सुख भले ही न प् सकें किन्तु लूटने वाले पूंजीपति वर्ग के हिस्से ka बोझ अपने कन्धों पर उठाते -उठाते असमय ही काल -कवलित हो रहे है.
       एक-मई मजदूर दिवस पर सभी साथियों ka  -क्रांतिकारी अभिनन्दन...

       दुनिया के  मजदूरों   एक हो -एक हो...!!

   इन्कलाब जिंदाबाद.....!

         
        श्रीराम तिवारी 
        इंदोर मध्य प्रदेश

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